वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाहिये। किसी ही पुण्यात्मा को ऐसी स्त्री मिलती है, जो उसे दिलसे चाहती हो। स्त्री का स्वभाव है कि, वह देखती किसी को है, बात किसी से करती है और चाहती किसी को है।
स्त्री की प्रीति-परीक्षा ।
एक सेठ का पुत्र, सत्संगके लिये, नित्य किसी महात्मा के पास जाया करता था। माँ-बापको उसका महात्मा के पास जाना पसन्द न था। उन्हें भय था कि, हमारा पुत्र वैरागियों की संगतिमें कहीं वैरागी न हो जाय, इसलिये उन्होंने शीघ्र ही उसकी शादी कर दी। घर में वह आ गयी। फिर भी लड़के का महात्माके पास जाना कम न हुआ। तब सेठ-सेठानीने बहुसे कहा कि, तू इसकी ऐसी सेवा कर, जो यह महात्माके पास जाना छोड़ दे। बहुने अपनी सेवा-टहल और नाज़-नखरों से पति को वशमें कर लिया। लड़के का मन महात्माकी संगतिसे हटने लगा। पहले वह रोज जाता था, आगे दूसरे-तीसरे दिन जाने लगा। एक दिन स्त्रीने कहा—“आप जब रातको चले जाते हैं, मैं अकेली पड़ी रहती हूँ। रात में स्त्रीका अकेला रहना अच्छा नहीं; इसके सिवा, रातको मुझे डर भी लगता है। यह बात सुन कर, लड़केने महात्माके पास जाना कृतई छोड़ दिया।
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