वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक दिन महात्मा कहीं जा रहे थे। राहमें वही लड़का उन्हें मिल गया। उन्होंने उससे न आनेको वजह पूछी। लड़केने कहा—“महाराज ! मेरी खी बड़ी ही पतिव्रता है। वह मुझे हर तरह सुखी रखती है। मेरे बिना वह क्षण-भर भी अकेली नहीं रह सकती। मेरे लिये वह प्राण देती हैं। उसको सच्ची प्रीति देखकर, मैं उसके वशमें हो गया हूँ और इसीसे आपकी सेवामें नहीं आ सकता।”
महात्माने कहा—“भैया ! सब अपने मतलबसे प्रीति करते हैं। तुम्हारी खी भी अपने सुखके लिये तुमसे प्रीति करती है, तुम्हारे सुखके लिये नहीं। अगर विश्वास न हो, तो आज-माइश कर लो।” लड़का इस बात पर राजी हो गया। महात्मा ने उसे श्वास रोकनेकी विधि समझा दी और कहा,—“एक दिन तुम अपनी खीसे कहना कि, आज हम खीर-पूरी खायेंगे। जब वह खीरपूरी बनाने लगे, तब तुम श्वास रोककर लम्बे पड़ जाना। जब वह संभस्केगी कि तुम मर गये, तब हमारी बातकी सवाईकी परीक्षा हो जायगी।”
त वा जि ही खर
एक दिन लड़केने घर पहुँचतेही खीसे कहा—“आज हमारा मन खीर-पूरी खाने पर है।” खीने कहा—“खामिन् ! अभी बनाती हूँ।” यह कह वह खीर-पूरी बनाने लगी। उधर लड़का साँस चढ़ाकर पड़ गया और मुर्दा हो गया। थोड़ी देर बाद जब खीर-पूरी बन गयी, खीने आवाज़ दी,—“आईये, खाना खा लीजिये।” जब वह न आया, तो खी स्वयम् आयी। देखा