वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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तो लड़का मरा पड़ा है। कहीं साँस नहीं है। स्त्री ने विचार किया, यह तो मर गया। अगर मैं अभी रोना-पीटना आरम्भ करती हूँ, तो न जाने कब तक भूखी मरूँगी, और खीर भी बिगड़ जायगी। इसलिये पहले खातूँ और जो बचे उसे डींकि पर रख दूँ। स्त्री ने अपने विचारानुसार पहले खूब खीर-पूरी खाई, और शेष रख दी। इसके बाद रोना और छाती-माथा कुटना शुरू किया। उसका रोना सुन, घरके लोग इकट्ठे हो गये और पूछा, "यह कैसे मर गया?" स्त्री ने कहा—"पेटमें दर्द बताते थे, शायद उसीसे मरे हैं।" लोगोंने कहा—"अब दैर करना व्यर्थ है। इसे शीघ्र शमशान पर ले चलो।" वे लोग उसे उठाने लगे, लेकिन उसके पैर दो खंभोंमें फँस जानेसे न निकले। तब लोगोंने कहा कि, इन खंभोंको काटकर पाँव निकालने चाहिये। यह सुनते ही स्त्री ने कहा—"ऐसा न करो ; खंभे कट जायँगे, तो फिर कौन बनवा देगा ? इसलिये खंभ न कटाकर, इनके पैर ही काट डालो ; क्योंकि पाँव आखिर जलाये ही जायेगे।" लोगोंने कहा "ठीक है।" ज्योंही उन्होंने पैर काटनेको कुल्हाड़ा उठाया कि, लड़का उठ बैठा और बोला—"मेरा दर्द मिट गया।" यह देख, लोग अपने-अपने ठिकाने चले गये। लड़का महात्म्याके पास गया और कहने लगा—"महात्मन् ! आपका कहना राई रत्नी सब है। अब मुझे ज़रा भी शक नहीं। निस्सन्देह स्त्री अपने ही लिये पतिको प्यार करती है। सबकी प्रीति भटी है। अब मैं गृहस्थाश्रममें न