भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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रहूंगा। बस, उसी दिनसे उसने अपनी स्त्रीको त्यागकर वैराग्य ले लिया।

स्त्री आफ़्तोंकी जड़ है।

स्त्री अनेक आपदाओं की मूल है। अनेक रूपवती स्त्रियाँ के कारण उनके पतियोंके प्राण नष्ट हुए हैं। नूरजहाँके कारण शेर अफ़ग़ानकी जान मारी गई। स्त्रीके पीछे सुन्द-उपसुन्द आपसमें लड़कर मर गये। स्त्रीके पीछे राजा नहुषको स्वर्ग से गिरना पड़ा। स्त्रीके कारण बालि मारा गया और रावण का सर्वनाश हुआ एवं शिशुपालका खिर काटा गया। स्त्री के पीछे ही भारतको भारत करने वाला महाभारत हुआ। स्त्री साँपसे भी भयङ्कर है। साँपके तो काटनेसे मनुष्य मरता है, पर स्त्रीकी रूप-चिन्तना-मात्रसे ही मनुष्य मर जाता है। विष खानेसे मनुष्य एक बार ही मरता है, पर स्त्री-विष के सम्बन्धसे मनुष्यको बारबार जन्म लेना और मरना पड़ता है; क्योंकि मरते समय पुरुष का मन अपनी स्त्रीमें ज़रूर जाता है। मरण-समय जिसकी वासना जिसमें रहती है, वह उसे अवश्य मिलता है। कहा है :—

वासना यत्र यस्य स्यात्संतं स्वप्नेषु परयति । स्वप्नवन्तरणो ह्येवं वासनातो वपुर्नृणाम् ॥