वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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( ७२ )
( ३ )
कामिनि काली नागिनी, तीन लोक मंझारि । नाम-सनेही ऊवरा, विषिया खाये भारि ॥
( ४ )
नारी कहुँ कि नाहरी, नख-सिरखसों यह खाय । जल बूड़ा तो ऊवरे, भग बूड़ा बहि जाय ॥
( ५ )
एक कनक अरु कामिनी, तजिये भगिये दूर । हरि विच परें अन्तरा, यम देसी मुख धूर ॥
( ६ )
जहाँ काम तहाँ राम नहीं, राम तहाँ नहीं काम । दोऊ कजहुँ ना रहें, काम राम इक ठाम ॥
( ७ )
अविनाशी विच धार तिन, कुल कंचन अरु नार । जो कोई इन ते बचै, सोई उतरे पार ॥
( १ )
स्त्रीको घूर कर न देखना चाहिये और देख कर उसके पीछे न लगना चाहिये ; क्योंकि स्त्रीको देखने-मात्रसे ही जहर चढ़ जाता है और मन और ही तरहका ही जाता है ।