वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
Devanagarihipublished648 पृष्ठ
पृष्ठ 16, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 16
श्रीः
महाराजा भर्तृहरि
हते हैं, कोई दो हजार वर्ष पहले, राजपूतानेके मालवा के प्रान्तकी उज्जयिनी नगरीमें,—जिसे आजकल उज्जैन कहते हैं,—एक उच्च श्रेणीके विद्वान्, नीतिकुशल, न्याय-परायण, प्रजावत्सल, सर्वगुणसम्पन्न नृपति राज करते थे। उस का शुभ नाम महाराज भर्तृहरि था। आप अपनी प्रजाको निज सन्तानसे भी अधिक चाहते थे और उसीकी हितचिन्तनामें दिन-रात मशगूल रहते थे। आपकी न्यायप्रियता और प्रजाहितैषणा की चर्चा सारे भारतमें फैल गई थी, इसलिये अन्य राज्योंकी बहु-संख्यक प्रजा भी अपना देश छोड़कर आपके राज्यमें आ कर बस गई थी; इससे उज्जयिनीकी शोभा-समृद्धि आजकलके कलकत्ते बम्बईके समान होगई थी। राजाके धर्मपरायण होनेके कार