वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
Devanagarihipublished648 पृष्ठ
पृष्ठ 17, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 17
( ६ )
३१ रे कामदेव ! रे कोकिल ! हे मूर्खा स्त्री ! अब तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते ... ३३३
३२ कमल में बैठे औरों को हाथी खा जाता है ... ३४८
३३ मनुष्य को तीनों ( चित्र में पाँच दिखाई गई हैं ) अवस्थाओंमें से किसी में भी सुख नहीं ३७६
३४ मनुष्य की वृद्धावस्था बढ़ी ही खेदजनक है ४५०
३५ स्वार्थियों का चित्र ... ४५२
३६ स्वार्थियों का चित्र ... ४५२
३७ मनुष्य और पशु-पक्षी सबमें एक ब्रह्म व्यापक है ४७४
३८ सर्प मैडक को खाता है और सर्प के मुखमें पड़ा हुआ मैडक मच्छरों को खाता है ...