भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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श्रीः

महाराजा भर्तृहरि

हते हैं, कोई दो हजार वर्ष पहले, राजपूतानेके मालवा के प्रान्तकी उज्जयिनी नगरीमें,—जिसे आजकल उज्जैन कहते हैं,—एक उच्च श्रेणीके विद्वान्, नीतिकुशल, न्याय-परायण, प्रजावत्सल, सर्वगुणसम्पन्न नृपति राज करते थे। इनका शुभ नाम महाराज भर्तृहरि था। आप अपनी प्रजाको निज सन्तानसे भी अधिक चाहते थे और उसीकी हितचिन्तनामें दिन-रात मशगूल रहते थे। आपकी न्यायप्रियता और प्रजाहितेषणा की चर्चा सारे भारतमें फैल गई थी, इसलिये अन्य राज्योंकी बहु-संख्यक प्रजा भी अपना देश छोड़कर आपके राज्यमें आ कर बर गई थी; इससे उज्जयिनीकी शोभा-सम्बद्धि आजकलके कलकत्ते बम्बईके समान होगई थी। राजाके धर्मपरायण होनेके कार