वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 19, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें[ २ ]
प्रजा भी धर्मात्मा थी। सभी अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मका पालन करते थे। ढौर-ढौर यज्ञ और हवन होते थे। मेघ समय पर यथेष्ट जल बरसाते थे। मालवा प्रान्तमें लोग अकालका नाम तक भूल गये थे। राजा-प्रजाके भाण्डार सदा धन-धान्यसे पूर्ण रहते थे। गरीब दोनों समय पेटभर अच्छ खाते थे। प्रजाको किसी बातका दुःख, क्लेश और अभाव नहीं था। चोरी, ज़ोरी, लूट-मार और डकैती एवं अत्याचार, अनाचार और व्यवहार प्रभुतिका नाम ही उठ गया था। कभी ही कोई ऐसा केस राजदरबारमें आता था। इन जुर्मोंके सुजूरिमोंको महाराज सख्त सज़ा देते थे। न्याय, नीति और धर्म पर चलनेवालोंके लिये महाराज ऊँचे दयालु थे; दुष्ट और अन्यायियोंके लिये वैसे ही कठोर थे। सारांश यह कि, महाराजमें सभी उत्तमोत्तम राजोचित गुण विधाताने दिये थे। आपके राज्यमें रोर बकरी एक घाट पानी पीते थे। कोई किसी की ओर आँख उठा कर नहीं देख सकता था। निबल और सबल सभी अपनी-अपनी खालमें मस्त थे। “जिसको लाटो उसकी मैस” वाड़ी कहावत चरितार्थ न होती थी। सब तो यह हैं, कि मालवा प्रान्तकी प्रजा फिरसे रामराज्य का सुख लूटती हुई, हृदयसे महाराजकी मङ्गल-कामना और उनके दीर्घजीवनके लिये जगदीशसे करजोड़ प्रार्थना करती थी। उस समय प्रजाको कोई ज़बर्दस्ती राजभक्तिका पाठ नहीं पढ़ाता था। सुखो होनेके कारण, प्रजा आपही राजाको पिताकी तरह मानती थी और उसमें अच्छल अटल भक्ति रखती थी।