भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

[ ३ ]

महाराजके एक छोटे भाई भी थे। उनका नाम राजकुमार विक्रम था। विक्रम भी बड़े भाईकी तरह ही विद्वान्, न्यायप्रायण, धर्मात्मा और राजनीतिकुशल थे। यह राजकुमार विक्रम ही हमारे सुप्रसिद्ध प्रतापशाली महाराजाधिराज वीर विक्रमादित्य थे, जिन्होंने भयंकर युद्धोंमें विदेशों आक्रमणकारियोंको परास्तकर, भारतकी रक्षा की और उन्हें इस देशसे निकाल बाहर कर, अपने नामसे संवत् चलाया, जो आजतक विक्रम-संवत्के नामसे पुकारा जाता है। आपहीका चलाया संवत् अबतक पञ्चाङ्गों, जन्त्रियों और साहूकारोंके बही-खातोंमें लिखा जाता है। यद्यपि कालकी कुटिल गति, जमानेके फेर या देशके दुर्भाग्य से आजकल ईस्वी सन्की तृती बोल रही है। लोग चिह्नों-पत्रियों एवं अन्यान्य कागज़ और दस्तावेजोंमें आपके संवत्को छोड़कर ईस्वी सन्को लिखनेकी मूर्खता करते हैं; पर बहुतसे सज्जन अपनी भूलको सुधारकर, फिर महाराजके संवत्से ही काम लेने लगे हैं। आशा है, सभी भूले हुए राह पर आजार्यंगे और संवत्के कारणसे महाराजका शुभ नाम यावत् चन्द्र-दिवारक इस लोकमें अमर रहेगा।

महाराज विक्रमके समयमें बौद्ध-धर्म बड़े जोरों पर था। ब्राह्मण-धर्मकी नींव खोखली हो गई थी। आपने ही बौद्धोंको मार भगाया और ब्राह्मण-धर्मकी फिरसे स्थापना की। आप अपने ज़मानेमें भारतके सर्वश्रेष्ठ नृपति समझे जाते थे। प्रायः सभी राजे-महाराजे आपको अपना सम्राट् या नेता मानते थे। सभी