वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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आपके ईशारों पर नाचते थे। आप कहनेको तो उज्जैनके राजा कहलाते थे, पर आपके राज्यकी सीमा बड़ी लम्बी-चौड़ी थी। अतुल धन-वैभव और सुविस्तृत राज्यके अधीश्वर होने पर भी, आपमें अस्मिमान नामको भी न था। आप छोटे-बड़े सभीसे मिलते और बातें करते थे। आप एक चट्टाई पर सोया करते और अपने पीनेके लिये क्षिप्रा नदीसे एक तूम्बा जल स्वयं अपने हाथोंसे भर लाते थे। आप आजकलके राजाओंकी तरह प्रजा के पैसेसे देश-आराम नहीं करते थे। आपका सारा समय प्रजा की भलाईमें ही व्यतीत होता था। आप अधिक-से-अधिक तीन चार घण्टे साते थे। रातके समय भेष बदल कर, आप अकसर शहरमें राश्ट लगाया करते थे और इस बातकी खोज करते थे, कि मेरी किस प्रजाको कौनसा दुःख है। आप जिसे दुःखी देखते थे, उसका दुःख या अभाव किसी न किसी तरह अवश्य ही दूर कर देते थे। अनेक मौकोंपर तो आपने अपनी वैश्वकीमत जानको खतरेंमें डालकर भी, प्रजाका दुःख दूर किया था। इसी से प्रजा आपको “परदुःख भञ्जन” कहती थी। भारतमें अबतक हजारों-लाखों राजा-महाराजा होगये होंगे, पर आपके सिवा और किसीको भी यह महाभूत उपधि नसीब नहीं हुई। हाँ, ईरानके खलीफ़ा हार्क-उर-रशीदके सम्बन्धमें भी ऐसी ही बातें सुनी जाती हैं। खलीफ़ा हार्क रशीद भी, महाराज विक्रमकी तरह, रातको भेष बदलकर घूमा करते और दीन-दुःखियोंका पता लगाकर उनके कष्ट मोचन किया करते थे। इस पृथ्वीपर आज