वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 22, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ५ ]
तक न जाने कितने एक-से-एक बढ़कर राजा-महाराजाँ होंगयें, जिनकी दृढ़ारसे पृथ्वी काँपती थी, जिनके पास असंख्य सेना-सामन्त और अतुल धन-भाण्डार था, पर आज उनका नाम भी कोई नहीं लेता। पर ऐसे प्रजावत्सल, परोपकारी, न्यायी और प्रजाकष्ट मोचन करनेवाले महीपालोंका नाम, जब तक पृथ्वी रहेगी, लोगोंकी ज़बान पर रहेगा। इस जगत्में जिनकी कीर्ति है, वह मर जानेपर भी अमर है। कीर्तिवान् मृतक नहीं समझा जाता। मृतक वही है, जिसकी कीर्ति या सुनाम नहीं है। महाराजा विक्रम, खलीफा हारुँ रशीद, नौशेरवाँ और सम्राट् अकबर प्रभृति आज इस नापायेदार दुनियामें नहीं हैं, पर उनका सुनाम लोगोंकी ज़बानपर है; अतः वे सशरीर न रहनेपर भी अमर हैं। धन्य है ऐसे नरपाल ! ऐसे भूपालोंसे ही महोकी शोभा है !
हमें यहाँ महाराजा विक्रमादित्यके सम्बन्धमें नहीं लिखना है। लिखना है,—महाराजा भर्तृहरिके सम्बन्धमें। प्रसंगवश हम महाराजा विक्रमादित्यके विषयमें इतना लिख गये। अब फिर असली सुकाम पर आते हैं। सुनिये, प्रातःस्मरणीय महाराजा विक्रम छोटे थे और महाराजा भर्तृहरि बड़े होनेके कारण राज करते थे। महाराजा विक्रम बड़े भाईके प्रधान मन्त्रीका काम करते थे। दोनों भाइयोंमें बड़ा प्रेम और सहभाव था। राम-लक्ष्मणकीसी जोड़ीथी। राम लक्ष्मणको जिस तरह बाहते थे, उसी तरह महाराजा भर्तृहरि भाईविक्रमको प्यार करतेथे। लक्ष्मण राममें जैसी श्रद्धा और भक्ति रखतेथे, वैसीही श्रद्धा और भक्ति विक्रमादित्य महाराजा