भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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भर्तृहरिमें रखते थे। दोनों ही दोनों के लिये जी-जानसे चाहते थे। बड़े भाई छोटेको निज पुत्रवत् समझते थे और छोटे बड़ेको पितृवत् मानते थे। महाराजा भर्तृहरि यद्यपि निराळसी और राजकार्यदर्श थे, तथापि उन्होंने राजकाजका विशेष भार विक्रमपर ही छोड़ रक्खा था। पिता जिसतरह सुपुत्रपर शुहस्थीका सारा भार छोड़कर एक तरह निश्चिन्त हो जाता है; उसी तरह महाराज भर्तृहरि विक्रमपर राजकाजका भार छोड़ निश्चिन्त हो गये थे। महाराज विक्रम भी अपनी कुशाग्रबुद्धि और राजनीतिज्ञतासे सारे काम सुचारु रूपसे चलाते थे और राजकाजकी जटिल समस्याओंके सुलझानेमें महाराजके दाहिने हाथ बने हुए थे। प्रजा सब तरह सुखी और प्रसन्न थी। राज्यमें आनन्दकी बहसुरी

। पर परमात्माकी इच्छा या होनहारके कारण आगे चलकर एक विषवृक्ष पैदा हो गया। उसने इन दोनों भाइयोंमें मनोमालिन्य करा दिया। इतना ही नहीं, दोनोंको एक दूसरेसे जुदा करा दिया। जिसका लोगोंको स्वप्नमें भी ख्याल नहीं था, जिसका होना लोग अलम्बव समझते थे, वही हुआ। सब है, भावी बड़ी बलवती है—होनी होकर रहती है।

महाराजा भर्तृहरिकी दो या तीन शादियाँ हो चुकी थीं। फिर भी, अपने किसी देशकी अपूर्व रूपलावण्यसम्पन्न, परमासुन्दरी, रतिमानमहिनी, सुनिमनमहिनी, अप्सराओंको भी शमनैवाली एक राजकुमारीसे शादी कर ली। नयी महारानीका नाम पिंगला था। महारानी पिंगलाके असाधारण रूपवती होनेके