वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 24, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ७ ]
कारण, महाराज उनके रूपपर ऐसे मोहित हुए कि अपनी विद्या-बुद्धि, विवेक और विचार प्रभृतिको ताकूपर रखकर, उनके हाथों बिक गये—उनके कीर्तिदास हो गये। ठीक शाहंशाह जहाँगीर और बेगम नूरजहाँका सा हाल हुआ। जिसतरह नूरजहाँके बिना दिल्लीश्वर जहाँगीरको एक क्षण कल न पड़ती थी; उसीतरह महाराज भर्तृहरिको भी महारानी पिंगला बिना जैन नहीं था। जिसतरह जहाँगीरकी नकेल नूरजहाँके हाथोंमें थी; उसीतरह महाराज भर्तृहरिकी नकेल पिंगलाके हाथोंमें थी। जिसतरह बादशाह जहाँगीर नूरजहाँके हाथोंकी कठपुतली थे; उसीतरह महाराज भर्तृहरि भी पिंगलाके हाथोंकी कठपुतली थे। बादशाह जहाँगीर, नामके बादशाह थे; नूरजहाँ ही बादशाहतको असल सञ्चालिका थी। वह जो चाहती थी सो करती थी। बादशाह सिकंदर वस्तुतः और मुहर भर कर देते थे। महाराज भर्तृहरिकी भी वही दशा थी। महारानी पिंगला जो चाहती थी, वही महाराजसे करा लेती थी। महाराज बिना कुछ सोचे-समझे, बिना आगा-पीछा देखे, आँखें बन्द करके, रानी पिंगलाकी इच्छानुसार चलते थे। उन दिनों महाराज सच्चे स्त्रैण हो गये थे। रानी पिंगलाने ऐसा जादू कर दिया था, कि महाराज अपने होश-हवास खोकर, पूरे तौरसे उनके ज़रूखरीद गुलाम हो गये थे।
स्त्रैण होना अच्छा नहीं, स्त्रीका गुलाम होना उचित नहीं, स्त्रीके वशमें होना सर्वव्याशक्ता बीज बोना है। पर इन मोहिनियोंके आगे प्रायः सभीकी सिटी गुम हो जाती है। हम