भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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महाराजाको ही दोषी क्यों ठहरावें, जब कि बड़े-बड़े योगीश्वर मोहिनियोंके रूप-जालमें फँसकर अपनी बुद्धि खो बैठे ? इन योगिजनेमनोहरा कामिनियोंकी मोहिनी शक्तिके आगे किसने हार नहीं मानी ? इनके मोहनमन्त्रसे कौन पागल नहीं हुआ ? इनकी मोहिनी मायामें कौन नहीं फँसा ? शिव जैसे परम योगीश्वर मोहिनीकी रूपच्छटा, वटक-मटक और नाज़-नखरों पर पागल हो गये । विश्वामित्र जैसे महामुनि मेनकाके रूप-जालमें फँसकर अपना तप भङ्ग कर बैठे । मरीचि और भृंगी जैसे महर्षि इनकी मनोमुखकर रूप-माधुरी पर सुखबुध खोकर तपस्या छोड़ बैठे ; तब साधारण मनुष्योंकी कौन बात है ? बड़े-बड़े शूरवीर जो जगत्को परास्त कर सकते हैं, वे भी इनके लामने कायर हो जाते हैं । किसी कविने कहा है—

व्याकीर्ण केशर करालमुखा मृगेन्द्रा,

नागाश्र भूरिमदराजिविराजमानाः ।

मेधाविनश्च पुरुषाः समरेषु शूराः,

क्षीसत्रिघो परमकापुरुषा भवन्ति ॥

गर्दन पर बिखरे हुए बालों वाला करालमुखी सिंह, अत्यन्त मदवाला हाथी और बुद्धिमान समरशूर पुरुष भी खियोंके आगे परम कायर हो जाते हैं ।

परमात्माने भी खियोंके साथ पक्षपात किया है । उसने इन्हें अपूर्व क्षमता प्रदान की है । उसी क्षमतासे ये पुरुषोंको