वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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उसी तरह अपने अधीन कर लेती है ; जिस तरह मनुष्य गाय बेल घोड़े घोड़ी प्रभृति पशुओंको अपने अधीन कर लेते हैं ; जो काम बड़े-बड़े धनुर्धारी अपनी वाणविद्यासे सिद्ध नहीं कर सकते, उसे ये अपने एक कटाक्षसे सिद्ध कर लेती है । इनके कटाक्षवाणोंके लगनेसे बड़े-बड़े युद्धोंको जीतने वाले, कभी हार न खानेवाले योद्धा सुख हो जाते हैं—भेड़, बकरीकी तरह इनके वशमें हो जाते हैं । ये मोहिनी नज़रोंमें मार लेती हैं ; मधुर-मधुर बोलनेसे चित्तको चुरा लेती हैं ; हाव-भाव या नाज़-नज़रोंसे हृदयको मोह लेती हैं । मामूली आदमियोंका तो जिक्र ही क्या—ये हवा और राख खाकर ज़िन्दगी बसर करने वाले महात्माओंको भी मोहित कर लेती हैं ; इसीसे लोग इन्हें मुनिमनमोहिनी भी कहते हैं ।
खियाँ आशिकू रूपी हिरनोके बाँधनेके लिये मजबूत रस्ती और हृदय-रूपी मदमत्त गजराजको बन्धनमें फँसा रखनेके लिये ऊर्बर्दस्त ज़ञ्जिर हैं । ये अबला होने पर भी सबला हैं, गो होने पर भी बाघ हैं ; कोमलाङ्गी होने पर भी बज़ाङ्गी हैं और निर्मला होने पर भी कुमला हैं । ये अपने ऊपर अनुरक्त हुए अपने पति या आशिकूको अपने वशमें कर लेती हैं । जब वह इनके वशमें हो जाता है, तब उसका ज्ञान काफ़ूर हो जाता है । ज्ञान-विहीन-अज्ञानी पति अपनी स्त्रीके सामने मूक पशुवत् हो जाता है । वह अपनी स्त्रीकी हाँ में हाँ मिलाता है, उसके कुकर्म देखकर भी नहीं बोलता ; क्योंकि खियाँ अपने चाहने