भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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[ १० ]

वालोंको ऐसा ही बना लेनेकी सामर्थ्य रखती है। किसीने कहा है :—

अलकको यथा रक्तोऽनिषीड्य पुरुषस्तथा ।

अबलासिर्बलाद्रक्तः पादमूले निपात्यते ॥

जिस तरह खियों लाखके रंगको जोरसे दबा कर अपने वरणोंमें लगाती है, उसी तरह वे अपने अनुसागों या चाहने वालेको अपने वरणोंमें डाल लेती है।

पर इन मोहिनियों पर जीजानसे लड़ू होनेवालों, इन पर सम्पूर्ण रूपसे विश्वास कर लेने वालों और इनकी अभ्यमक्ति करने वालोंको अन्तमें दुःख पाना, धोखा खाना और पछताना पड़ता है, इसमें जरा भी शक नहीं; अतः इनको मध्य अवस्थामें सेवन करना चाहिये; क्योंकि यदि पुरुष इनसे दूर रहे, तो फल नहीं मिलता और एकदम इनका हो ले, तो वे सम्बन्धाशका कारण हो जाती हैं। जो पुरुष स्त्रैण या स्त्रीके गुलाम हो जाते हैं, जो इनको सिर पर चढ़ा लेते हैं, जो इनके ही मत पर चलते हैं, उनको दुःख भोगने पड़ते हैं और ये उन्हें खूब नाच नचाती और स्वयं स्वतन्त्र होकर मन-माने दुष्कर्म करती हैं। कहा है :—

तासां वाक्यानि इत्यानि स्वल्पानि सुगुरुष्यपि ।

करोति यः इती लोके लघुत्वं याति सर्वतः ॥