वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ११ ]
नाति प्रसंगः प्रमदासु काव्यो नैच्छेद्वलं स्त्रीषु विवर्द्धमानम् ।
अति प्रसक्तैः पुरुषैर्युतास्ताः क्रीडन्ति काकैरिव लूनपञ्चैः ॥
जो कृती पुरुष स्त्रियोंको छोटी-बड़ी या थोड़ी-बहुत बातों को मानता है, वह सब तरहसे नीचा देखता है ।
स्त्रियोंसे अति प्रसंग न करना चाहिये ; क्योंकि अति आसक्त हुए पुरुषोंसे वह पंख-नुचे हुए कव्चेके समान खेल करती हैं ।
अनुभवो विद्वान् और विकालब्ध ऋषि-मुनियोंने जो कहा है, वह अक्षर-अक्षर सत्य है । जो शास्यकारोंके अमूल्य उपदेशों पर ध्यान नहीं देते, उन्हें दुःखके गहरे गड्ढेमें गिर कर कष्ट उठाना ही पड़ता है । हमारे महाराज भर्तृहरि यद्यपि असाधारण विद्वान् और बुद्धिमान थे ; पर भावीके वश होनेके कारण उन्होंने शास्त्रोपदेश पर ध्यान न देकर महारानी पिङ्गलाको सिर पर चढ़ा लिया ; उसकी प्रत्येक बात मानने और हरेक काम उसकी इच्छानुसार करने लगे । नतीजा यह हुआ कि, उसने महाराजको अपने ऊपर पूर्णरूपसे अनुरक्त पा, उनको खेलका पक्षीसा जान लिया और उन्हें अपनी इच्छानुसार नचाने लगी । साथ ही निर्भय होकर कुकर्म करने पर उतारू हो गई । वह क्या करने लगी, उसका क्या नतीजा हुआ, ये सब बातें पाठकोंको आगे चलकर मालूम हो जायँगी । यहाँ हमें यही विचारना है, कि महाराज भर्तृहरि जैसे चतुरचूडामणि और विद्वान् राजाने ऐसा मौका क्यों दिया ?
पाठक ! जैसी भावी होती है, मनुष्यकी बुद्धि भी वैसी