वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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वालोंको ऐसा ही बना लेनेकी सामर्थ्य रखती है। किसीने कहा है :—
अलकको यथा रक्तोऽनिषीड्य पुरुषस्तथा ।
अबलासिर्बलाद्रक्तः पादमूले निपात्यते ॥
जिस तरह खियों लाखके रंगको जोरसे दबा कर अपने वरणोंमें लगाती है, उसी तरह वे अपने अनुसागों या चाहने वालेको अपने वरणोंमें डाल लेती है।
पर इन मोहिनियों पर जीजानसे लड़ू होनेवालों, इन पर सम्पूर्ण रूपसे विश्वास कर लेने वालों और इनकी अभ्यमक्ति करने वालोंको अन्तमें दुःख पाना, धोखा खाना और पछताना पड़ता है, इसमें जरा भी शक नहीं; अतः इनको मध्य अवस्थामें सेवन करना चाहिये; क्योंकि यदि पुरुष इनसे दूर रहे, तो फल नहीं मिलता और एकदम इनका हो ले, तो वे सम्बन्धाशका कारण हो जाती हैं। जो पुरुष स्त्रैण या स्त्रीके गुलाम हो जाते हैं, जो इनको सिर पर चढ़ा लेते हैं, जो इनके ही मत पर चलते हैं, उनको दुःख भोगने पड़ते हैं और ये उन्हें खूब नाच नचाती और स्वयं स्वतन्त्र होकर मन-माने दुष्कर्म करती हैं। कहा है :—
तासां वाक्यानि इत्यानि स्वल्पानि सुगुरुष्यपि ।
करोति यः इती लोके लघुत्वं याति सर्वतः ॥
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नाति प्रसंगः प्रमदासु काव्यो नैच्छेद्वलं स्त्रीषु विवर्द्धमानम् ।
अति प्रसक्तैः पुरुषैर्युतास्ताः क्रीडन्ति काकैरिव लूनपञ्चैः ॥
जो कृती पुरुष स्त्रियोंको छोटी-बड़ी या थोड़ी-बहुत बातों को मानता है, वह सब तरहसे नीचा देखता है ।
स्त्रियोंसे अति प्रसंग न करना चाहिये ; क्योंकि अति आसक्त हुए पुरुषोंसे वह पंख-नुचे हुए कव्चेके समान खेल करती हैं ।
अनुभवो विद्वान् और विकालब्ध ऋषि-मुनियोंने जो कहा है, वह अक्षर-अक्षर सत्य है । जो शास्यकारोंके अमूल्य उपदेशों पर ध्यान नहीं देते, उन्हें दुःखके गहरे गड्ढेमें गिर कर कष्ट उठाना ही पड़ता है । हमारे महाराज भर्तृहरि यद्यपि असाधारण विद्वान् और बुद्धिमान थे ; पर भावीके वश होनेके कारण उन्होंने शास्त्रोपदेश पर ध्यान न देकर महारानी पिङ्गलाको सिर पर चढ़ा लिया ; उसकी प्रत्येक बात मानने और हरेक काम उसकी इच्छानुसार करने लगे । नतीजा यह हुआ कि, उसने महाराजको अपने ऊपर पूर्णरूपसे अनुरक्त पा, उनको खेलका पक्षीसा जान लिया और उन्हें अपनी इच्छानुसार नचाने लगी । साथ ही निर्भय होकर कुकर्म करने पर उतारू हो गई । वह क्या करने लगी, उसका क्या नतीजा हुआ, ये सब बातें पाठकोंको आगे चलकर मालूम हो जायँगी । यहाँ हमें यही विचारना है, कि महाराज भर्तृहरि जैसे चतुरचूडामणि और विद्वान् राजाने ऐसा मौका क्यों दिया ?
पाठक ! जैसी भावी होती है, मनुष्यकी बुद्धि भी वैसी
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जाती है। अगर भावीके अनुसार बुद्धि न हो जाय, तो भावी कैसे हो? दशरथनन्दन महाराजा रामचन्द्र तो विष्णुके अवतार माने जाते हैं; वे कुटियामें सीताको छोड़कर, सोनेके हिरनके पीछे तीर कमान लेकर क्यों भागे? साधारण आदमी भी समझ सकता है, कि सोनेका हिरन नहीं हो सकता—सुवर्ण मृगका होना असम्भव है। पर भगवान् रामचन्द्रजीको इतना भी खयाल न हुआ! हो कैसे? होनी तो कुछ और ही थी। जैसी होनी थी, वैसी ही बुद्धि रामचन्द्रजीकी हो गई। उनके और लक्ष्मणजीके सीताको सुनी छोड़ जानेसे, रावणको मौका मिला और वह यतिका वेष धरकर सीताको लङ्कामें ले गया। परिणाममें घोर युद्ध हुआ और रावण मारा गया।
हमारे प्रातःस्मरणीय महाराज भर्तृहरिकी बुद्धि यदि नहीं मारी जाती, वे पिङ्गलाके हाथकी कठपुतली न हो जाते; तो पिङ्गलाको व्यभिचारिणी होनेका मौका कैसे मिलता? प्राण-प्यारे भाई विक्रमसे वियोग कैसे होता? शेषमें, अपनी प्राण-प्रियाके कुकर्मका हाल जानकर, महाराजको विरक्ति कैसे होती और वे राजपाठ त्यागकर आदर्श योगिराज कैसे होते? कहते हैं, संसारमें एक पत्ता भी बिना परमेश्वरकी मरज़ीके नहीं हिलता। इस जगत्में जो कुछ होता है, वह जगदीशकी इच्छासे होता है; वे जो चाहते हैं, सो करते हैं। पर जगदीश जो करते हैं, वह प्राणीकी भलाईके लिए करते हैं; इसमें सन्देह नहीं। जगदीश की इच्छासे ही, कई रानियोंके होते हुए भी, महाराजने पिङ्गला
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का पाणिग्रहण किया। जगदीशकी इच्छासे ही, वह सब विधा-बुद्धि विसराकर रानीके कीर्तदास हुए। इससे महाराज का बड़ा उपकार हुआ। ऐसा भला हुआ, जिसकी तुलना नहीं। उनको संसारसे विरक्ति न होती, तो क्या आज उनका नाम इस जगत्में अमर रहता? उनकी कीर्ति अचल होती? उन्होंने जिस महोच्च पद—परमपद—की प्राप्ति कर ली, क्या उसकी प्राप्ति कर सकते? हरगिज़ नहीं। इसीसे कहना पड़ता है, कि महाराज और गोस्वामी तुलसीदासजी दोनों हीको, आरम्भमें, परले स्त्रिके विषयी और स्त्रीण होनेसे ही वैराग्य हुआ। बुराईसे भलाई हुई और परमात्मा जो करता है, वह मनुष्यकी भलाईके लिये ही करता है, यह बात सत्य प्रमाणित हुई। विषवृक्षसे अमृत-फलकी उत्पत्ति हुई। ठीक गोस्वामि तुलसीदासजी की सी घटना घटी। गुसाईं जीको भी खींचे ही कारणसे वैराग्य हुआ और हमारे महाराजको भी खींचे ही कारणसे। हाँ, घटनाक्रममें थोड़ा अन्तर अवश्य है।
स्त्रियोंके स्वभावकी कोई बात समझमें ही नहीं आती। ये अपने व्याहता सुन्दर, खूबसूरत, नौजवान, बलवान, वीर्यवान, चतुर और कामकला-कुशल पतिको त्याग कर एक नीच-कुलोत्पन्न, गंवार, वदसूरत, कालेकल्लूटे, अघेड़ और बूढ़े पर मरने लगती हैं। ये पुरुषमात्रको भोगनेकी इच्छा रखती हैं। इन्हें वयस और रूपकुरुपसे कोई मतलब नहीं। इन्हें न कोई प्यारा है न कुप्यारा। जिस तरह गाय नई-नई घास पसन्द
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जाती है। अगर भावीके अनुसार बुद्धि न हो जाय, तो भावी कैसे हो ? दशरथनन्दन महाराजा रामचन्द्र तो विष्णुके अवतार माने जाते हैं; वे कुटियामें सीताको छोड़कर, सोनेके हिरनके पीछे तीर कमान लेकर क्यों भागे ? साधारण आदमी भी समझ सकता है, कि सोनेका हिरन नहीं हो सकता—सुवर्ण मृगका होना असम्भव है। पर भगवान् रामचन्द्रजीको इतना भी ख्याल न हुआ ! हो कैसे ? होनी तो कुछ और ही थी। जैसी होनी थी, वैसी ही बुद्धि रामचन्द्रजीकी हो गई। उनके और लक्ष्मणजीके सीताको सूनी छोड़ जानेसे, रावणको मौका मिला और वह यतिका वेष धरकर सीताको लड्डामें ले गया। परिणाममें खोर युद्ध हुआ और रावण मारा गया।
हमारे प्रातःस्मरणीय महाराज भर्तृहरिकी बुद्धि यदि नहीं मारी जाती, वे पिङ्गलाके हाथकी कठपुतली न हो जाते; तो पिङ्गलाको व्यभिचारिणी होनेका मौका कैसे मिलता ? प्राण-प्यारे भाई विक्रमसे वियोग कैसे होता ? शेषमें, अपनी प्राण-प्रियाके कुकर्मका हाल जानकर, महाराजको विरक्ति कैसे होती और वे राजपाट त्यागकर आदर्श योगिराज कैसे होते ? कहते हैं, संसारमें एक पत्ता भी बिना परमेश्वरकी मरज़ोके नहीं हिलता। इस जगत्में जो कुछ होता है, वह जगदीशकी इच्छासे होता है; वे जो चाहते हैं, सो करते हैं। पर जगदीश जो करते हैं, वह प्राणीकी भलाईके लिए करते हैं; इसमें सन्देह नहीं। जगदीश की इच्छासे ही, कई रानियोंके होते हुए भी, महाराजने पिङ्गला
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का पाणिग्रहण किया। जगदीशकी इच्छासे ही, वह सब विद्या-बुद्धि विसराकर रानीके कीर्तदास हुए। इससे महाराज का बड़ा उपकार हुआ। ऐसा भला हुआ, जिसकी तुलना नहीं। उनको संसारसे विरक्ति न होती, तो क्या आज उनका नाम इस जगत्में अमर रहता? उनकी कीर्ति अचल होती? उन्होंने जिस महोच्च पद—परमपद—की प्राप्ति कर ली, क्या उसकी प्राप्ति कर सकते? हरगिज़ नहीं। इसीसे कहना पड़ता है, कि महाराज और गोस्वामी तुलसीदासजी दोनों हीको, आरम्भमें, परले स्त्रिके विषयी और स्त्रीण होनेसे ही वैराग्य हुआ। बुराईसे भलाई हुई और परमात्मा जो करता है, वह मनुष्यको भलाईके लिये ही करता है, यह बात सत्य प्रमाणित हुई। विषवृक्षसे अमृत-फलकी उत्पत्ति हुई। ठीक गोस्वामि तुलसीदासजी की सी घटना घटी। गुसाईं जीको भी स्त्रीके ही कारणसे वैराग्य हुआ और हमारे महाराजको भी स्त्रीके ही कारणसे। हाँ, घटनाक्रममें थोड़ा अन्तर अवश्य है।
स्त्रियोंके स्वभावकी कोई बात समझमें ही नहीं आती। ये अपने व्याहता सुन्दर, खूबसूरत, नौजवान, बलवान, वीर्यवान, चतुर और कामकला-कुशल पतिको त्याग कर एक नौच-कुलोत्पन्न, गांवार, वदसूरत, कालेकल्ले, अघेड़ और बूढ़े पर मरने लगती हैं। ये पुरुषमात्रको भोगनेकी इच्छा रखती हैं। इन्हें वयस और रूपकुरूपसे कोई मतलब नहीं। इन्हें न कोई प्यारा है न कुप्यारा। जिस तरह गाय नई-नई घास पसन्द
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करती है, उसी तरह ये नित्य नये पुरुषोंको चाहती है। जब तक इन्हें कोई चाहनेवाला नहीं मिलता या मौका हाथ नहीं आता, तभी तक ये सदा बनी रहती है। ये अपने सच्चे प्रेमी-कों नहीं चाहती, उससे घृणा करती हैं अथवा उदासीन रहती हैं; किन्तु जो इन्हें नहीं चाहता, जो इनके साथ चाले चलता है, जो परले खिरेका धूर्त और दगाबाज होता है, जो दुर्गुणों-की मूर्ति और दुष्टताकी खान होता है, उसके लिये ये अत्यातुर रहती है।
✓ जो पुरुष स्त्रियोंको सदुगुण-शालिनी और उत्तम लभनावाली समझते हैं, वे बड़ी गलती करते हैं। ये इतनी बालाक और मायाविनी होती हैं कि, अच्छेसे अच्छे बालाकको भी अपने कुकर्मोंका पता नहीं लगने देतीं। ये किसीकी भी बात-कों जान-नुनकर पेटमें नहीं पचा सकती, पर अपनी बातको छिपाना ये खूब जानती हैं। जब ये कुकर्मों पर उत्तर पड़ती है, तब इन्हें लोकलाज, लोकनिन्दा प्रभृतिकी परवा नहीं रहती। दुनियाँ बुलाई करे करो; माता पिता, भाई और जेठ ससुर प्रभृतिकी नाक-कटाई हो तो हो—यहाँ तक कि, इनके जीवनमें भी सन्देह हो जाय, तो हो जाय; पर ये जिस बातको धार लेती हैं, उससे पीछे कदम नहीं रखतीं। देखनेमें पुण्यवत् कोमल दीखती हैं, पर हृदय इनका वज्रवत् कठोर होता है। इनको किसी पर दया-माया नहीं। इन्हें तो अपनी कुवासना पूरी करनेसे मतलब। अपनी कुवासना
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करनेके लिये, ये अपने सब सुखांके देनेवाले पतिके प्राण नाश कर देती हैं, अपने जेठ-ससुरको मरवा डालती हैं। यहाँ तक, कि अपनी पेटकी औलाड़ तककी हत्यापर उतारू हो जाती हैं। कहा है—
आस्तां तावरिकमस्येन दौरात्येनेह योषिताम् ।
त्रिभृतं स्वेदरेणापि धनित पुलं स्वकं रूपा ॥
स्त्रियोंके दौरात्यकी बात कहाँ तक कहें? ये कोधमें आकर अपने पेटके पुत्रको भी मार डालती हैं।
महारानी पिङ्गला पर महाराज भरद्वाहिर जान देते थे, अठ पहर चौसठ घड़ी उसीका ध्यान रखते थे। महारानी रातको दिन और दिनों रात कहती, तो महाराज भी वैसा ही कहते। हर तरह उसको आज्ञापालन करने और हाँ में हाँ मिलानेको तैयार रहते थे। महाराजमें कोई दोष भी न था। आप पूर्ण विद्वान्, वलवान्, वीर्यावान् और सर्वकला-कुशल पुरुष थे; पर महारानी ऊपरसे आपके चाहनेका ढोंग करती थी और भीतरसे आपसे उदासीन रहकर एक नीचको चाहती थी। महारानी जैसी रूपवती थी, वैसी ही चालाक, मक्कार और दुश्चरित्रा थी। ऊपरसे गौरी और भीतरसे काली, प्रत्यक्षमें सुन्दर और अप्रत्यक्षमें असुन्दर, प्रकटमें सती और अप्रकटमें असती थी। उसने लोकनिन्द्रा और कुलकी कानकी परवा न करके, एक नीच नमकहराम अस्तबलके दारोगासे आशनाई
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कर ली। यह बात उसने बहुत दिनों तक महाराजसे छिपाई। महाराज जब महलोंमें आते, तब वह अपने हावभाव और नाज़-नखरोंसे महाराजका मन हाथोंमें कर लेती। उनसे ऐसी-ऐसी बातें करती, जिनसे महाराज यही समझते कि, मेरी रानी सच्ची सती-साध्वी है। इस ज़मानेकी दूसरी सीता-सावित्री है। पर उनके पीठ फेरते ही दारोगाको बुलवा कर उसके साथ पैश-आराम करती। महाराज बेचारे इस त्रियाचरित्रको समझ न सकते थे। किसी ने ठीक ही कहा है—
नृपस्य चित्तं कृपणस्य चित्तं मनोरथदुर्जन मानवानां ।
स्त्रियाश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः न।
राजाके चित्तको, कृपणके धनको, दुष्टोंके मनोरथको, स्त्रियोंके चरित्रको और पुरुषके भाग्यको देवता भी नहीं जानते, मनुष्य कौन चीज़ है ?
बहुत दिनों तक यह कलंक-कथा छिपी रही। मनुष्य अपने पापोंको कितना ही छिपावे, पर एक न एक दिन वे प्रकट हो ही जाते हैं, एक न एक दिन संसार उनको जान ही जाता है। मनुष्य मनुष्यके गुप्त कामोंको नहीं देख सकता, मनुष्य मनुष्यके दिलका हाल नहीं जान सकता ; पर परमात्मा से कुछ नहीं छिपता, उसकी नज़र हर जगह पहुँचती है। वह सात कोठोंके अन्दर भी मनुष्यके कुकर्मोंको देख लेता है। वह घटघट-निवासी अन्तर्ध्यामी मनुष्यमात्रके हृदयके भीतरकी
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करते हैं, उनको सती-साध्वी सम्बन्ध रहते हैं, उन पर सन्देह भी नहीं करते, वे बड़ी भूल करते हैं। किसी विद्वान्ने ठीक ही कहा है—
‘यदि स्यात्पावकः शीतः श्रेणो वा शशलाच्छनः ।
त्रीणां तदा सतीत्वं स्याद्यदि स्याद् दुर्जनो हितः ॥’
“अगर आग शीतल हो जाय, चन्द्रमा गर्म हो जाय, दुर्जन हितकारी हो जाय; तो स्त्रियोंके सतीत्वका विश्वास हो। महाराज! स्त्रियोंकी मीठी बातोंमें न भूलना चाहिये। इनकी बातें जैसी हैं, वैसा दिल नहीं है। कहा है :—
सुसुखेन वदन्ति वल्युना प्रहरन्त्येव शितेन चेतसा ।
मधु तिष्ठति वाचि योषितां ॥ हृदये हालाहलं महद्विषम् ॥
“स्त्रियाँ सुन्दर मुँहसे मनोह-मनोहर बातें करती हैं और तीक्ष्ण चित्तसे प्रहार करती हैं। इनकी बातोंमें मधु और हृदयमें हालाहल विष रहता है।”
राजकुमार विक्रमकी सारी बातें चुपचाप सुनकर महाराजने कहा—“भाई! तुमको भ्रम हुआ है। तुम्हारी बुद्धि विकृत हो गई है; तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। महारानी पिङ्गला आदर्श सती हैं। इस समय उनके जैसी सती विरल हैं। वह रात-दिन मेरे लिये प्राण देती है, मेरा ही जप-तप और ध्यान करती है, मेरे सुखमें सुखी और दुःखमें दुःखी
॥ ‘हृदि हालाहलमेव केवलम्’ ग्रन्थान्तरे ।
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रहती हैं। ऐसी सतीको असती कह कर, उन पर कलंक-कालिमा पोतकर तुम अच्छा नहीं करते। और, जो हुआ सो हुआ। तुम छोटे भाई हो, इससे क्षमा करता हूँ; अगर और कोई होता, तो अभी शूली पर चढ़वा देता। आज तो कहा सो कहा, किन्तु भविष्यमें फिर कभी ऐसी बेहूदा बात ज़बानसे न निकालना।
राजकुमारने, महाराजके इतना कहने पर भी, उन्हें बहुत कुछ समझाया, कुछ प्रमाण भी दिये; पर पिंगलाके रंगमें रंगे हुए महाराज पर कुछ भी असर न हुआ। अन्तमें जब राजकुमारने इससे सुफलकी कोई सम्भावना न देखी, तब मनमें यह समझ कर कि, समय आये बिना कोई काम नहीं होता, समय आने पर भाई की आँखें आप ही खुल जायँगी; उस समय चुप रह जाना ही उचित समझा।
कह चुके हैं, कि महारानी पिङ्गला बड़ी चालाक थीं। उन्हें यह बात पहले ही मालूम हो गई, कि मेरे कुकर्म की बात—मेरे पाप-कर्मका रहस्य—राजकुमार जान गये हैं। इसलिये उन्होंने पहलेसे ही चाल चलनी शुरू कर दी। वे महाराजके प्रति पहले से भी अधिक प्रेम-भाव दिखाने लगीं। जब उन्हें अच्छी तरहसे मालूम हो गया, कि महाराजके दिलमें उनकी ओरसे ज़रा भी बहम नहीं है, उनका उन पर सोलह आने विश्वास है, उन्होंने एक दिन उन्हें खूब ही राजी करके, राजकुमारके विरुद्ध उनके कान भर दिये। कह दिया,—“आप बुरा न मानियेगा, आपके
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छोटे भाईकी नीयत बड़ी खराब है। मैं उनकी माताके समान हूँ; पर वे इस बातको न समझ कर मुझे बुरी दृष्टिसे देखते हैं। और कोई होती, तो उनके फन्देमें फँस जाती-पर मुफ्त पर उनका फन्द़ा कोई काम नहीं कर सकता। परमात्मा ऐसे कुकर्मोंका मुँह न दिखावे। मैंने सुना है, कि वह अपने नगर-सेठकी पुत्रबधू पर भी आशङ्क है। उसके पीछे उन्होंने बहुत दिनोंसे दूतियाँ लगा रखी हैं। उस बेवारीका अनेक प्रकारसे फुसलाया, तरह-तरहके लालच दिये; पर वह भी मेरी तरह सबकी पतिव्रता है, इसलिये आज तक उनके जालमें नहीं फँसी। अब सुनतो हूँ, उन्होंने नगर-सेठकी धमकी दी है। नहीं जानता, यह बात कहाँ तक सच है। वे आपके सुनाममें बह्म लगाते हैं। अतः मेरी विनीत प्रार्थना है, कि आप उन पर नज़र रखें, उनसे सावधान रहें।”
महाराजोंको इन बातोंको सुन कर महाराज सब हो गये, मुँह सूख गया, चेहरा तमतमा आया, आँख लाल हो गईं। उनका मन कभी कहता था:—“नहीं नहीं, ये सब नितान्त अमूलक बातें हैं। तुम्हारा भाई विक्रम ऐसा नहीं है। वह पण्डित है, वह पर-स्त्रियोंको अपनी निज जननीके समान समझता है।” कभी उनका मन कहता था,—“हो सकता है, विक्रमकी चरित्र खराब हो। पिंगला सी सती नारी मिथ्या दोष नहीं लगा सकती। इसे उससे क्या बैर है? हाय! जर्ज-हरिका भाई और ऐसा दुराचारी!” इस तरह उधेड़बन करते-
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करते, तानाबाना बिनते-बिनते, कभी इधर कभी उधर भटकते-भटकते, शेषमें महाराजाका मन महारानी पिङ्गलाकी बातों पर हो उठर गया। उन्हें विश्वास हो गया, कामिल यकीन हो गया, कि विक्रम सचमुच ही दुराचारी और व्यभिचारी है। पर, इतने पर भी, उन्होंने प्रकाशमें भाईसे कुछ न कहा।
इधर तो रानीने महाराजको यह पट्टी पढ़ायी; उधर नगर-सेठको बुलवाकर उससे कहलवाया कि, तुमसे कह सो करो, नहीं तो तुम्हारा जानकी खैर नहीं। राजा मेरी मुट्ठीमें है। मैं तुम्हारे बच्चे-बच्चेको कोल्हमें पिठवाकर तुम्हारा सर्वस्व अपहरण करा लूँगी।
नगरसेठही क्यों—सारा नगर जानता था, कि महाराज पिंगलाके हाथकी कठपुतली हैं। वह जो नाच नचाती है, महाराज वही नाच नाचते हैं। इसलिये सेठजीने हाथ जोड़कर कहलवाया—“महारानीजी! आप इतनी बातें क्यों कहती हैं? दास तो आपको आज्ञासे बाहर नहीं। आपका हुकम सर आँखोंपर। जो हुकम कीजिये, गुलाम वही करनेको तैयार है।
सेठकी यह बात सुनकर रानीने कहलवाया—“आप जानते ही हैं, कि राजकुमार विक्रम कैसे अत्याचारी है। प्रजाको कितना कष्ट देते हैं। महाराज स्वयं तो राजकाज देखते नहीं, सारा काम राजकुमार ही चलाते हैं। मैं नहीं चाहती, कि वह प्रजाको कष्ट दे। इसवास्ते किसी तरह महाराजका मन ख़राब करके, उन्हें यहाँसे नौ दो ग्यारह करवाना चाहती हूँ। यह
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काम आपको सहायता से बड़ी आसानी से हो जायगा। आप कल राज-सभामें जाकर पुकार कीजिये, कि महाराज ! आपके छोटे भाई साहब बहुतही अत्याचारी, अनाचारी और न्यमि-चारः हो गये हैं। वे बहुत दिनोंसे मेरी पुत्रवधूको अपनी प्रण-यिनी बनानेकी चेष्टा कर रहे हैं। उन्होंने उसके फँसानेके लिये—बड़े-बड़े जाल फँलाये, पर मेरी सती-सावित्रीसी पुत्र-वधू उनके जालमें न फँसी ; इसी से मेरी इज्जत आवल अबतक बची हुई है। आप यदि न सुनेंगे तो मैं आपका राज्य छोड़ कर किसी और राजाके राज्यमें चला जाऊँगा।”
नगरसेठ रानीकी बातों पर राजी हो गया। दूसरे ही दिन जबकि महाराजकी सभा लगी हुई थी, हाली मुहाली, कामदार, मुसाहिब, मन्त्री, सेनापति प्रभृति सब बैठे हुए थे ; नगरसेठ दरवाजेसे हो कानोंके पर्दे फाड़नेवाला “फरियाद है” “फरियाद है” का शोर मचाता हुआ राज-सभामें पहुँचा। महाराजने उसे सामने बुलाकर उसकी फरियाद सुनी। उसने रानीकी सिखाई हुई सारी बातें ज्योंकी त्यों महाराजको कह सुनाईं। महाराजके दिलमें रानीने पहले ही ये बातें बैठ दी थीं। अब सेठकी शिकायतसे उन्हें कोई सन्देह न रह गया। रानी की कही हुई सारी बातें उनके नेत्रोंके सामने नाचने लगीं। उनका चेहरा क्रोधके मारे लाल हो गया।
राजकुमार उस वक्त सभामें ही बैठे थे। वे इस बातको सुनकर, मनमें समझ गये, कि यह पद्मयन्त्र पिङ्गलाका रत्न
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हुआ है। उन्होंने सेठसे कहा—“सेठजी! भगवान्का भय करो, मनुष्यसे मत डरो। इस बुढ़ापेमें स्वार्थके लिये झूठ बोल कर क्यों पापकी गठरी बाँधते हो? परमात्मा सब देखता है। उसकी नजरोंसे कुछ भी नहीं छिपा है। मैं तुम्हारी पुत्रबन्धुको जानता भी नहीं। मैं नहीं जानता, वह काली है या गौरी, भूली है या बुरी, मेरी तो वह माताके समान है। मैं पर-स्त्रियों को अपनी जननीके समान समझता हूँ। जिसमें आपका पुत्र तो मेरा मित्र है। मित्रकी स्त्री तो सच्ची माता ही होती है। कहा है :—
राजपत्नी गुरोःपत्नी मिलपत्नी तथैव च ।
पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैता मातरःस्मृताः ॥
“राजाकी स्त्री, गुरुकी स्त्री, मित्रकी स्त्री, स्त्रीकी माता और अपनी माँ—ये पाँच माता कहलाती हैं। इसके सिवा, मैं अपनी विवाहिता स्त्रोंको छोड़ कर, जगत्की सभी नारियोंको माता समझता हूँ ; क्योंकि जो पराई स्त्रियोंको माताके समान नहीं मानता, वह महा मूर्ख है। उसके पापका प्रायश्चित्त नहीं। पर-स्त्री-गामीको नरकोंकी असहाय यंत्रणा सहनी पड़ती है। शास्त्रों में कहा है :—
मातृवत् परदारान्च परद्रव्याणि लोषन्त ।
आत्मनस्तर्षभूतानि यः पश्यति सपश्यति ॥
“पर स्त्रियोंको माताके समान, पराये धनको मिट्टीके ढेले
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के समान और सब प्राणियोंको अपने समान समझता है, वही देखता है और तो अच्छे या अहान्नी हैं।
“आप धर्मसे डरिये ; धर्मके सिवा कोई सच्चा साथी नहीं है। और सब जीतेजोके साथी हैं, मरने पर कोई साथ न देगा। आप मुझ पर वृथा दोषारोप करके यदि अपना मतलब बना लोगे, तो क्या होगा ? पार्थिव धन-वैभव आपके साथ न जायँगे। धन वैभवका क्या ठिकाना ? आज है, कल नष्ट हो जाय। कहा है :—
अनित्यानि शरीराणि विभो नैव शाश्वतः ।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंयहः ॥
शरीर अनित्य है, ऐश्वर्य्य अनित्य है, मृत्यु सदैव पास है, इसलिये धर्म करो।
और भी कहा है—
चलालक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवितमन्दिरं ।
चलाचले च संसारे धर्म एकोहि निश्चलः ॥
“इस चराचर जगत्में धन-प्राण सभी चलायमान हैं ; केवल धर्म ही निश्चल है। अतः सेठजी ! धर्मको न छोड़ो। धर्मसे डर कर, आप अपनी बातको वापिस लीजिये। आप किसीके बहकानेसे मुझ पर विध्या दोष लगा रहे हैं। जब इस बातकी जाँचकी जायगी, तब सारा भण्डा फूट जायगा—आपका जाल खुल जायगा। उस समय आपकी क्या दशा होगी, जानते हो ?
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राजकुमारकी ये बात सुनतेही महाराज भर्तृहरि लाल-पीली आँखें करके बोले—“अरे कुलाङ्गर ! नीच ! अधम ! पापी ! तु मेरे सामने जियादा बात न बना । मैं तेरे सब हालोंको जानता हूँ । अब तेरी चालाकी और मक्कारी न चलेगी । यदि अपनी जीवनरक्षा चाहता है ; तो इसी क्षण मेरे नगरसे निकल जा ! शीघ्र काला मुँह कर ! मैं तेरा यह काला मुँह देखना पसन्द नहीं करता ! शीघ्र ही मेरी नज़रके सामनेसे हट जा, नहीं तो तुझे अभी शूली पर चढ़वा दूँगा ! राजा पिता है ; प्रजा पुत्रके समान है । राजा ही यदि ऐसा अन्याय करे, तो प्रजा किसके पास जाय ? मैं प्रजाके सुखसे सुखी और प्रजाके दुःखमें दुःखी रहता हूँ । दूर हो मेरे सामनेसे ! दूर हो !!”
भाईकी यह बातें सुनकर राजकुमार विक्रमने कहा—“भाई ! मैं तो अभी—इसी क्षण चला जाऊँगा । आपके राजमें जल भी न पीऊँगा । पर आप कोधान्त्र होकर कर क्या रहे हैं ! आपको कम-से-कम इस मुकदमेकी जाँच तो करनी थी । इस तरह इकतरफ़ा फैसला देना, किसी भी राजा या विचारकको शोभा नहीं देता । अगर आप इसी तरह न्याय करेंगे, तो आपकी प्राणप्यारी प्रजाका नाश हो जायगा, वह आपसे दुःखी होकर और राज्यमें जा बसेगी । आप जिसके हाथकी कठ-पुतली बन रहे हैं, वह आपके साथ छल कर रही है । उसके जुबमें मैं ही एक काँटा हूँ ; इसलिये वह मुझे निकलवानेको गरजसे ही ये जाल रच रही है । खैर, मैं तो जाता हूँ ; पर

(चित्र: भर्तृहरि की तपस्या / तपोवन)
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आपके अनिष्टकी आशङ्का अब भी मेरे हृदयमें खलबली मचाती है। आपको एक दिन पछताना होगा। आपका हृदय मुझे याद करके रोयेगा। परमात्मा आपका मङ्गल करे, आपकी आँख भी मैली न हो।” यह कह कर राजकुमार फौनर समाभवनसे निकल बनको चले गये। महाराज सिर पर हाथ धर कर कुछ सोचमें पड़ गये। इसके बाद कई वर्ष निकल गये। कोई नई घटना न घटी।
नगरीका एक दूरिष्ट ब्राह्मण, अपनी इष्ट-सिद्धिके लिये वनमें जाकर किसी देवताकी घोर तपस्या करता था। उसे तप करते हुए अनेक वर्ष बीत गये। तपःकष्टसे जब उसका शरीर एकदम क्रुश हो गया; तब देवताका आसन हिला। उसने ब्राह्मणके सामने सशरीर आकर उससे कहा—“ब्राह्मण! मैं तेरी तपस्यासे अतीव सन्तुष्ट हुआ हूँ, इसलिये तुझे यह “फल” देता हूँ। यह फल मामूली फल नहीं है। इसका नाम “अमर-फल” है। इसके खानेवाले पर मौतका जोर नहीं चलता। मृत्यु उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकती। तू इसे खाकर पृथिवी पर अमर रह और सुखपूर्वक अपनी जिन्दगी बसर कर!” यह कहकर और फल देकर देवता अन्तर्धान हो गया।
ब्राह्मण उस “अमरफल” को लेकर अपने घर आया और अपनी स्त्रीको उस फलका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। ब्राह्मणी उस फलकी बात सुन कर सन्तुष्ट नहीं, वरन् असन्तुष्ट हुई। उसने कहा—“नाथ! देवताने आपको ‘अमर फल’ दिया