भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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छोटे भाईकी नीयत बड़ी खराब है। मैं उनकी माताके समान हूँ; पर वे इस बातको न समझ कर मुझे बुरी दृष्टिसे देखते हैं। और कोई होती, तो उनके फन्देमें फँस जाती-पर मुफ्त पर उनका फन्द़ा कोई काम नहीं कर सकता। परमात्मा ऐसे कुकर्मोंका मुँह न दिखावे। मैंने सुना है, कि वह अपने नगर-सेठकी पुत्रबधू पर भी आशङ्क है। उसके पीछे उन्होंने बहुत दिनोंसे दूतियाँ लगा रखी हैं। उस बेवारीका अनेक प्रकारसे फुसलाया, तरह-तरहके लालच दिये; पर वह भी मेरी तरह सबकी पतिव्रता है, इसलिये आज तक उनके जालमें नहीं फँसी। अब सुनतो हूँ, उन्होंने नगर-सेठकी धमकी दी है। नहीं जानता, यह बात कहाँ तक सच है। वे आपके सुनाममें बह्म लगाते हैं। अतः मेरी विनीत प्रार्थना है, कि आप उन पर नज़र रखें, उनसे सावधान रहें।”

महाराजोंको इन बातोंको सुन कर महाराज सब हो गये, मुँह सूख गया, चेहरा तमतमा आया, आँख लाल हो गईं। उनका मन कभी कहता था:—“नहीं नहीं, ये सब नितान्त अमूलक बातें हैं। तुम्हारा भाई विक्रम ऐसा नहीं है। वह पण्डित है, वह पर-स्त्रियोंको अपनी निज जननीके समान समझता है।” कभी उनका मन कहता था,—“हो सकता है, विक्रमकी चरित्र खराब हो। पिंगला सी सती नारी मिथ्या दोष नहीं लगा सकती। इसे उससे क्या बैर है? हाय! जर्ज-हरिका भाई और ऐसा दुराचारी!” इस तरह उधेड़बन करते-