भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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रहती हैं। ऐसी सतीको असती कह कर, उन पर कलंक-कालिमा पोतकर तुम अच्छा नहीं करते। और, जो हुआ सो हुआ। तुम छोटे भाई हो, इससे क्षमा करता हूँ; अगर और कोई होता, तो अभी शूली पर चढ़वा देता। आज तो कहा सो कहा, किन्तु भविष्यमें फिर कभी ऐसी बेहूदा बात ज़बानसे न निकालना।

राजकुमारने, महाराजके इतना कहने पर भी, उन्हें बहुत कुछ समझाया, कुछ प्रमाण भी दिये; पर पिंगलाके रंगमें रंगे हुए महाराज पर कुछ भी असर न हुआ। अन्तमें जब राजकुमारने इससे सुफलकी कोई सम्भावना न देखी, तब मनमें यह समझ कर कि, समय आये बिना कोई काम नहीं होता, समय आने पर भाई की आँखें आप ही खुल जायँगी; उस समय चुप रह जाना ही उचित समझा।

कह चुके हैं, कि महारानी पिङ्गला बड़ी चालाक थीं। उन्हें यह बात पहले ही मालूम हो गई, कि मेरे कुकर्म की बात—मेरे पाप-कर्मका रहस्य—राजकुमार जान गये हैं। इसलिये उन्होंने पहलेसे ही चाल चलनी शुरू कर दी। वे महाराजके प्रति पहले से भी अधिक प्रेम-भाव दिखाने लगीं। जब उन्हें अच्छी तरहसे मालूम हो गया, कि महाराजके दिलमें उनकी ओरसे ज़रा भी बहम नहीं है, उनका उन पर सोलह आने विश्वास है, उन्होंने एक दिन उन्हें खूब ही राजी करके, राजकुमारके विरुद्ध उनके कान भर दिये। कह दिया,—“आप बुरा न मानियेगा, आपके