भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 36

[ १६ ]

करते हैं, उनको सती-साध्वी सम्बन्ध रहते हैं, उन पर सन्देह भी नहीं करते, वे बड़ी भूल करते हैं। किसी विद्वान्ने ठीक ही कहा है—

‘यदि स्यात्पावकः शीतः श्रेणो वा शशलाच्छनः ।

त्रीणां तदा सतीत्वं स्याद्यदि स्याद् दुर्जनो हितः ॥’

“अगर आग शीतल हो जाय, चन्द्रमा गर्म हो जाय, दुर्जन हितकारी हो जाय; तो स्त्रियोंके सतीत्वका विश्वास हो। महाराज! स्त्रियोंकी मीठी बातोंमें न भूलना चाहिये। इनकी बातें जैसी हैं, वैसा दिल नहीं है। कहा है :—

सुसुखेन वदन्ति वल्युना प्रहरन्त्येव शितेन चेतसा ।

मधु तिष्ठति वाचि योषितां ॥ हृदये हालाहलं महद्विषम् ॥

“स्त्रियाँ सुन्दर मुँहसे मनोह-मनोहर बातें करती हैं और तीक्ष्ण चित्तसे प्रहार करती हैं। इनकी बातोंमें मधु और हृदयमें हालाहल विष रहता है।”

राजकुमार विक्रमकी सारी बातें चुपचाप सुनकर महाराजने कहा—“भाई! तुमको भ्रम हुआ है। तुम्हारी बुद्धि विकृत हो गई है; तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। महारानी पिङ्गला आदर्श सती हैं। इस समय उनके जैसी सती विरल हैं। वह रात-दिन मेरे लिये प्राण देती है, मेरा ही जप-तप और ध्यान करती है, मेरे सुखमें सुखी और दुःखमें दुःखी

॥ ‘हृदि हालाहलमेव केवलम्’ ग्रन्थान्तरे ।

वैराग्य शतक · पृष्ठ 36, कुल 648 में से · BharatKosha