भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

[ १६ ]

कर ली। यह बात उसने बहुत दिनों तक महाराजसे छिपाई। महाराज जब महलोंमें आते, तब वह अपने हावभाव और नाज़-नखरोंसे महाराजका मन हाथोंमें कर लेती। उनसे ऐसी-ऐसी बातें करती, जिनसे महाराज यही समझते कि, मेरी रानी सच्ची सती-साध्वी है। इस ज़मानेकी दूसरी सीता-सावित्री है। पर उनके पीठ फेरते ही दारोगाको बुलवा कर उसके साथ पैश-आराम करती। महाराज बेचारे इस त्रियाचरित्रको समझ न सकते थे। किसी ने ठीक ही कहा है—

नृपस्य चित्तं कृपणस्य चित्तं मनोरथदुर्जन मानवानां ।

स्त्रियाश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः न।

राजाके चित्तको, कृपणके धनको, दुष्टोंके मनोरथको, स्त्रियोंके चरित्रको और पुरुषके भाग्यको देवता भी नहीं जानते, मनुष्य कौन चीज़ है ?

बहुत दिनों तक यह कलंक-कथा छिपी रही। मनुष्य अपने पापोंको कितना ही छिपावे, पर एक न एक दिन वे प्रकट हो ही जाते हैं, एक न एक दिन संसार उनको जान ही जाता है। मनुष्य मनुष्यके गुप्त कामोंको नहीं देख सकता, मनुष्य मनुष्यके दिलका हाल नहीं जान सकता ; पर परमात्मा से कुछ नहीं छिपता, उसकी नज़र हर जगह पहुँचती है। वह सात कोठोंके अन्दर भी मनुष्यके कुकर्मोंको देख लेता है। वह घटघट-निवासी अन्तर्ध्यामी मनुष्यमात्रके हृदयके भीतरकी

वैराग्य शतक · पृष्ठ 35, कुल 648 में से · BharatKosha