वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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करते, तानाबाना बिनते-बिनते, कभी इधर कभी उधर भटकते-भटकते, शेषमें महाराजाका मन महारानी पिङ्गलाकी बातों पर हो उठर गया। उन्हें विश्वास हो गया, कामिल यकीन हो गया, कि विक्रम सचमुच ही दुराचारी और व्यभिचारी है। पर, इतने पर भी, उन्होंने प्रकाशमें भाईसे कुछ न कहा।
इधर तो रानीने महाराजको यह पट्टी पढ़ायी; उधर नगर-सेठको बुलवाकर उससे कहलवाया कि, तुमसे कह सो करो, नहीं तो तुम्हारा जानकी खैर नहीं। राजा मेरी मुट्ठीमें है। मैं तुम्हारे बच्चे-बच्चेको कोल्हमें पिठवाकर तुम्हारा सर्वस्व अपहरण करा लूँगी।
नगरसेठही क्यों—सारा नगर जानता था, कि महाराज पिंगलाके हाथकी कठपुतली हैं। वह जो नाच नचाती है, महाराज वही नाच नाचते हैं। इसलिये सेठजीने हाथ जोड़कर कहलवाया—“महारानीजी! आप इतनी बातें क्यों कहती हैं? दास तो आपको आज्ञासे बाहर नहीं। आपका हुकम सर आँखोंपर। जो हुकम कीजिये, गुलाम वही करनेको तैयार है।
सेठकी यह बात सुनकर रानीने कहलवाया—“आप जानते ही हैं, कि राजकुमार विक्रम कैसे अत्याचारी है। प्रजाको कितना कष्ट देते हैं। महाराज स्वयं तो राजकाज देखते नहीं, सारा काम राजकुमार ही चलाते हैं। मैं नहीं चाहती, कि वह प्रजाको कष्ट दे। इसवास्ते किसी तरह महाराजका मन ख़राब करके, उन्हें यहाँसे नौ दो ग्यारह करवाना चाहती हूँ। यह