भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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हुआ है। उन्होंने सेठसे कहा—“सेठजी! भगवान्का भय करो, मनुष्यसे मत डरो। इस बुढ़ापेमें स्वार्थके लिये झूठ बोल कर क्यों पापकी गठरी बाँधते हो? परमात्मा सब देखता है। उसकी नजरोंसे कुछ भी नहीं छिपा है। मैं तुम्हारी पुत्रबन्धुको जानता भी नहीं। मैं नहीं जानता, वह काली है या गौरी, भूली है या बुरी, मेरी तो वह माताके समान है। मैं पर-स्त्रियों को अपनी जननीके समान समझता हूँ। जिसमें आपका पुत्र तो मेरा मित्र है। मित्रकी स्त्री तो सच्ची माता ही होती है। कहा है :—

राजपत्नी गुरोःपत्नी मिलपत्नी तथैव च ।

पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैता मातरःस्मृताः ॥

“राजाकी स्त्री, गुरुकी स्त्री, मित्रकी स्त्री, स्त्रीकी माता और अपनी माँ—ये पाँच माता कहलाती हैं। इसके सिवा, मैं अपनी विवाहिता स्त्रोंको छोड़ कर, जगत्की सभी नारियोंको माता समझता हूँ ; क्योंकि जो पराई स्त्रियोंको माताके समान नहीं मानता, वह महा मूर्ख है। उसके पापका प्रायश्चित्त नहीं। पर-स्त्री-गामीको नरकोंकी असहाय यंत्रणा सहनी पड़ती है। शास्त्रों में कहा है :—

मातृवत् परदारान्च परद्रव्याणि लोषन्त ।

आत्मनस्तर्षभूतानि यः पश्यति सपश्यति ॥

“पर स्त्रियोंको माताके समान, पराये धनको मिट्टीके ढेले