वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ २५ ]
के समान और सब प्राणियोंको अपने समान समझता है, वही देखता है और तो अच्छे या अहान्नी हैं।
“आप धर्मसे डरिये ; धर्मके सिवा कोई सच्चा साथी नहीं है। और सब जीतेजोके साथी हैं, मरने पर कोई साथ न देगा। आप मुझ पर वृथा दोषारोप करके यदि अपना मतलब बना लोगे, तो क्या होगा ? पार्थिव धन-वैभव आपके साथ न जायँगे। धन वैभवका क्या ठिकाना ? आज है, कल नष्ट हो जाय। कहा है :—
अनित्यानि शरीराणि विभो नैव शाश्वतः ।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंयहः ॥
शरीर अनित्य है, ऐश्वर्य्य अनित्य है, मृत्यु सदैव पास है, इसलिये धर्म करो।
और भी कहा है—
चलालक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवितमन्दिरं ।
चलाचले च संसारे धर्म एकोहि निश्चलः ॥
“इस चराचर जगत्में धन-प्राण सभी चलायमान हैं ; केवल धर्म ही निश्चल है। अतः सेठजी ! धर्मको न छोड़ो। धर्मसे डर कर, आप अपनी बातको वापिस लीजिये। आप किसीके बहकानेसे मुझ पर विध्या दोष लगा रहे हैं। जब इस बातकी जाँचकी जायगी, तब सारा भण्डा फूट जायगा—आपका जाल खुल जायगा। उस समय आपकी क्या दशा होगी, जानते हो ?