भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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[ २६ ]

राजकुमारकी ये बात सुनतेही महाराज भर्तृहरि लाल-पीली आँखें करके बोले—“अरे कुलाङ्गर ! नीच ! अधम ! पापी ! तु मेरे सामने जियादा बात न बना । मैं तेरे सब हालोंको जानता हूँ । अब तेरी चालाकी और मक्कारी न चलेगी । यदि अपनी जीवनरक्षा चाहता है ; तो इसी क्षण मेरे नगरसे निकल जा ! शीघ्र काला मुँह कर ! मैं तेरा यह काला मुँह देखना पसन्द नहीं करता ! शीघ्र ही मेरी नज़रके सामनेसे हट जा, नहीं तो तुझे अभी शूली पर चढ़वा दूँगा ! राजा पिता है ; प्रजा पुत्रके समान है । राजा ही यदि ऐसा अन्याय करे, तो प्रजा किसके पास जाय ? मैं प्रजाके सुखसे सुखी और प्रजाके दुःखमें दुःखी रहता हूँ । दूर हो मेरे सामनेसे ! दूर हो !!”

भाईकी यह बातें सुनकर राजकुमार विक्रमने कहा—“भाई ! मैं तो अभी—इसी क्षण चला जाऊँगा । आपके राजमें जल भी न पीऊँगा । पर आप कोधान्त्र होकर कर क्या रहे हैं ! आपको कम-से-कम इस मुकदमेकी जाँच तो करनी थी । इस तरह इकतरफ़ा फैसला देना, किसी भी राजा या विचारकको शोभा नहीं देता । अगर आप इसी तरह न्याय करेंगे, तो आपकी प्राणप्यारी प्रजाका नाश हो जायगा, वह आपसे दुःखी होकर और राज्यमें जा बसेगी । आप जिसके हाथकी कठ-पुतली बन रहे हैं, वह आपके साथ छल कर रही है । उसके जुबमें मैं ही एक काँटा हूँ ; इसलिये वह मुझे निकलवानेको गरजसे ही ये जाल रच रही है । खैर, मैं तो जाता हूँ ; पर