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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

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राजकुमारकी ये बात सुनतेही महाराज भर्तृहरि लाल-पीली आँखें करके बोले—“अरे कुलाङ्गर ! नीच ! अधम ! पापी ! तु मेरे सामने जियादा बात न बना । मैं तेरे सब हालोंको जानता हूँ । अब तेरी चालाकी और मक्कारी न चलेगी । यदि अपनी जीवनरक्षा चाहता है ; तो इसी क्षण मेरे नगरसे निकल जा ! शीघ्र काला मुँह कर ! मैं तेरा यह काला मुँह देखना पसन्द नहीं करता ! शीघ्र ही मेरी नज़रके सामनेसे हट जा, नहीं तो तुझे अभी शूली पर चढ़वा दूँगा ! राजा पिता है ; प्रजा पुत्रके समान है । राजा ही यदि ऐसा अन्याय करे, तो प्रजा किसके पास जाय ? मैं प्रजाके सुखसे सुखी और प्रजाके दुःखमें दुःखी रहता हूँ । दूर हो मेरे सामनेसे ! दूर हो !!”

भाईकी यह बातें सुनकर राजकुमार विक्रमने कहा—“भाई ! मैं तो अभी—इसी क्षण चला जाऊँगा । आपके राजमें जल भी न पीऊँगा । पर आप कोधान्त्र होकर कर क्या रहे हैं ! आपको कम-से-कम इस मुकदमेकी जाँच तो करनी थी । इस तरह इकतरफ़ा फैसला देना, किसी भी राजा या विचारकको शोभा नहीं देता । अगर आप इसी तरह न्याय करेंगे, तो आपकी प्राणप्यारी प्रजाका नाश हो जायगा, वह आपसे दुःखी होकर और राज्यमें जा बसेगी । आप जिसके हाथकी कठ-पुतली बन रहे हैं, वह आपके साथ छल कर रही है । उसके जुबमें मैं ही एक काँटा हूँ ; इसलिये वह मुझे निकलवानेको गरजसे ही ये जाल रच रही है । खैर, मैं तो जाता हूँ ; पर

भर्तृहरि की तपस्या

(चित्र: भर्तृहरि की तपस्या / तपोवन)

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आपके अनिष्टकी आशङ्का अब भी मेरे हृदयमें खलबली मचाती है। आपको एक दिन पछताना होगा। आपका हृदय मुझे याद करके रोयेगा। परमात्मा आपका मङ्गल करे, आपकी आँख भी मैली न हो।” यह कह कर राजकुमार फौनर समाभवनसे निकल बनको चले गये। महाराज सिर पर हाथ धर कर कुछ सोचमें पड़ गये। इसके बाद कई वर्ष निकल गये। कोई नई घटना न घटी।

नगरीका एक दूरिष्ट ब्राह्मण, अपनी इष्ट-सिद्धिके लिये वनमें जाकर किसी देवताकी घोर तपस्या करता था। उसे तप करते हुए अनेक वर्ष बीत गये। तपःकष्टसे जब उसका शरीर एकदम क्रुश हो गया; तब देवताका आसन हिला। उसने ब्राह्मणके सामने सशरीर आकर उससे कहा—“ब्राह्मण! मैं तेरी तपस्यासे अतीव सन्तुष्ट हुआ हूँ, इसलिये तुझे यह “फल” देता हूँ। यह फल मामूली फल नहीं है। इसका नाम “अमर-फल” है। इसके खानेवाले पर मौतका जोर नहीं चलता। मृत्यु उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकती। तू इसे खाकर पृथिवी पर अमर रह और सुखपूर्वक अपनी जिन्दगी बसर कर!” यह कहकर और फल देकर देवता अन्तर्धान हो गया।

ब्राह्मण उस “अमरफल” को लेकर अपने घर आया और अपनी स्त्रीको उस फलका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। ब्राह्मणी उस फलकी बात सुन कर सन्तुष्ट नहीं, वरन् असन्तुष्ट हुई। उसने कहा—“नाथ! देवताने आपको ‘अमर फल’ दिया

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है ; पर इससे अपना कुछ घटनेके बजाय उल्टा बढेगा । अगर वह धन दैते तो हमारा भला होता । हम लोग जन्मसे दरिद्र हैं । हमारे घरमें प्रत्येक वस्तुका अभाव है । आजकल धन बिना सुख कहाँ ? धन बिना समाजमें प्रतिष्ठा कहाँ ? जिसके पास धन है, वही सुखी है । निर्धनको इस जगत्में सुख नहीं । दरिद्रीसे भार्द-बन्धु लजाते हैं ; उसे अपना कहनेमें भी उन्हें शम आती है ; इसलिये वे लोग अपना रिश्ता या सम्बन्ध तक छिपाते हैं । दरिद्र विपत्तियोंका घर है । यह मरणका दूसरा पदार्थ है । नाथ ! दरिद्र देहवारियोंको परम दुःख और अपमान है । दरिद्रोंको नाते-रिश्तेदार मरा हुआ ही समझते हैं । शोषसे शोष रही मिट्टीको क्रोमृत है, पर दरिद्रोंको क्रोमृत नहीं ; निर्धन उस मिट्टीसे भी निकम्मा है । हम लोग दरिद्रताके मारे यों हो इस ज़िन्दगीसे आरी आ रहे हैं ; अब तो अपना कुछ और भी बढ़ जायगा । अबतक यह आशा तो थी, कि कभी मृत्यु आकर हमारे कष्टोंका अन्त कर देगी ; पर जब यह फल खा लिया जायगा, तब तो अनन्त काल तक महादरिद्र-कष्ट भोगना पड़ेगा । सारी ज़िन्दगी, जिसका ओर-छोर नहीं, दरिद्रावस्थामें ही व्यतीत करनी पड़ेगी । यह फल तो उनके लिये अच्छा है, जिन्हें परमात्माने धन-रत्न-राजपाठ प्रभृति सभी संसारी सुख दिये हैं । आप यदि मेरो सलाह मानें, तो इसे महाराजा भर्तृहरिको दीजिये और उनसे बदलेमें धन लेकर सुखसे शेष जीवन व्यतीत कीजिये ।”

वाराणसीतक २७६

तपस्वी ब्राह्मण महाराजाविराज भुन्दुरि को "अमरपल्ल" द रथा है।

पृ० २८

महाराजाधिराज भुतुहरी

महाराजाधिराज भुतुहरी "अमरकल" जैसे अलकस्य कलाओं, अलकस्य आकर, आपनी प्यारी रानी पिंगला को देते हैं।

पृष्ठ ३३

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बहुत कुछ तर्क-वितर्क और सोच-विचारके बाद ब्राह्मण- देवता भी इसी बात पर जम गये। उन्हें ब्राह्मणीकी बातही सोलह आने ठीक जची। इसलिये वह कपड़े पहन, फल हाथमें ले, महाराजकी सभामें पहुँचे। चोबदारने खबर दी। महाराजने उस ब्राह्मणको अपने निकट बुला लिया और पूछा—“देवता ! क्या चाहते हो ? आज्ञा कीजिये ; इसी क्षण आपकी आज्ञा पालन की जायगी।” ब्राह्मणने उस अमर फलकी सारी कहानी सुना- कर, वह फल राजाके हाथमें दे दिया। राजाने भी उसे खुशीसे ले लिया और ब्राह्मणको कई लक्ष सुवर्ण मुद्रा देनेका हुक्म दिया। ब्राह्मण अशरफियाँ लेकर हँसता-हँसता अपने घर आया।

अब महाराज मन-ही-मन विचार करने लगे—“वास्तवमें यह फल परमात्माने ही दिया करके मेरे पास भिजवाया है। पर अब यह समझमें नहीं आता, कि इस फलको मैं खाऊँ या अपनी प्राणप्रतिमा, प्राणाविका, प्राणप्रदा रानी पिङ्गलाको खिलाऊँ। अगर मैं इसे खाऊँगा, तो सदा अमर रहूँगा ; मेरा रूप-यौवन सदा स्थिर रहेगा ; दुःखदायी बुढ़ापा पास न आवेगा, पर मेरी प्यारी पिङ्गला, मेरे सुखोंकी मूल पिंगला तो कुछ दिन बाद ही बूढ़ी हो जायगी—उसका यह रूप-लावण्य नष्ट हो जायगा। उस दशामें, मैं किसके साथ सुख उपभोग करूँगा ? इसलिये मैं इसे पिंगलाको ही खिलाऊँगा। वह यदि अमर रहेगी, वह यदि बूढ़ी न होगी, यदि उसकी सौन्दर्य-प्रभा ज्यों की त्यों बनी रहेगी ; तो मैं उसीके साथ संसारी सुखोंका आनन्द

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उपभोग करूँगा। यह सोच और इस विचार पर दृढ़ हो, महाराजा फलको हाथमें लेकर रनवासको चल दिये।

महाराजके महलके द्वार पर पहुँचते ही दासियोंने जाकर महारानीको महाराजके आगमन की सूचना दी। पिङ्गला शीघ्रही तैयार हो, उन्हें लेनेके लिये द्वार तक आई और उनके गलेमें हाथ डाल उन्हें अन्दर लिवा ले गई। उन्हें एक परमोत्कृष्ट आसन पर बिठा आप भी उनकी बगलमें बैठ गई और अपने हाव-भाव और ताज़ीनख़रोंसे उनका मन अपने हाथमें करने लगी। शेषमें पूछा—“महाराज ! आज असमयमें इस दासी पर कैसे कृपा की ?” महाराजने कहा—“प्रिये ! आज एक अपूर्व फल मेरे हाथ लगा है। उसीको लेकर तुम्हारे पास आया हूँ।”

रानीने कहा—“महाराज ? वह फल मुझे दिखाइये और यह भी बताइये, उसमें ऐसा कौनसा गुण है, कि जिससे आप उसकी इतनी लम्बी-चौड़ी तारीफ करते हैं ?

राजाने कहा—“रानी ! यह फल, जिसे आप मेरे हाथमें देख रही हैं, “अमरफल” है। इसे एक देवताने एक ब्राह्मणको उसके तपसे सन्तुष्ट होकर दिया था। ब्राह्मणने इसे मुझे दिया। इसमें यह गुण है, कि इसका खानेवाला न कभी बूढ़ा होता और न कभी मरता है ; सदा नौजवान रहता है। मैं चाहता हूँ कि इस फलको तुम खाओ, जिससे तुम सदा नवयुवती बनी रहो—तुम्हारा रूपलावण्य सदा आज जैसा ही बना रहे।” यह कहकर राजाने वह अमर फल रानीके हाथमें दे दिया।

A black and white photograph showing a close-up of a hand holding a white sheet of paper. The paper has a series of small, dark circular holes punched along its right edge, spaced out vertically. The hand is visible on the right side, with the thumb and part of the index finger gripping the edge of the paper. The background is dark and out of focus, with some vertical lines suggesting a door or wall. The lighting is bright on the paper, making the holes stand out.

वैराग्यशतक

महाराजाविराज मर्तुहरि की परमप्यारी रानी पिशला, अहाराज का दिवा हुआ 'अमरफल' अपने बारा दारोगा को दे रही है।

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रानी उस फलको हाथमें लेकर कहने लगी,—“नहीं, प्राण-नाथ ! आप ही इस फलको खायें ; क्योंकि आप ही मेरी माँगके सिन्दूर हैं, आप ही से मेरा सौभाग्य है, आप ही मेरे सूर्य और चाँद हैं, आप हमसे मुझे जगत्में उजियाला हैं ।” परमात्मा आपको सदा अजर-अमर रखे, इसीमें मेरा सुख-सौभाग्य है ; रानीकी ये बातें बनावटी थीं । मुँहमें राम और बगलमें छुरीवाली बात थी । उसके पेटमें कपटकी कतरनी चल रही थी । राजा उसके जालमें पूर्णरूपसे फँसे हुए थे, इसलिये वह उसके फरेबोंको कैसे समझ सकते थे ? उन्होंने फिर कहा—“नहीं, यह फल तुमको ही खाना होगा । तुम्हारे फल खानेसे ही मुझे सन्तोष होगा ।” रानी तो यह चाहती ही थी, कि फलको राजा न खावे और वह मेरे हाथमें रहे ; इसलिये रोपमें वह राजी होगई और कहने लगी—“आपकी आज्ञाको मैं उल्लङ्घन नहीं कर सकती । जिसमें आप राजी उसीमें मैं राजी हूँ । आपके ही सन्तोषमें मुझे सन्तोष है । आपका जब यही हुक्म है, तो मैं ही इस फलको खाऊँगी ; पर यह देवता का दिया हुआ है, इसलिये इसे अशुद्ध अवस्थामें न खाऊँगी । ज्ञान-ध्यान पूजा-पाठ करके खाऊँगी ।” राजा उस मक्काराकी बात पर राजी हो गये और फल उसे देकर सभामें लौटआये ।

राजाके पीठ फेरते ही, रानीने दासी भेजकर, अपने उपपति—अस्तबलके दारोगाको बुला भेजा । वह शौतान सन्देशा पाते ही दौड़ा चला आया । रानी उसे लेनेको दरवाजे पर पहुँची और उसके गलेमें हाथ डालकर महलमें ले आई । उसे मक्कमली

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पल्लगपर बैठकर, आप उसकी गोदमें पड़ गईं और उसे प्यार करने लगीं।

दारोगाने पूछा—“रानी साहिवा ! आज यह गुलाम असमयमें ही क्यों याद किया गया ? क्या बात है ?”

रानी—प्यारे ! आज महाराजने मुझे एक फल दिया है । उसके खानेसे मनुष्य अमर बना रहता है, जवानी सदा स्थिर रहती है, बुढ़ापा कभी नहीं आता । राजा साहब मुझसे उस फलके खानेको कह गये हैं । मैंने उनसे वादा भी कर लिया है । पर, प्राणाधार ! संसारमें मुझे आपसे अधिक कोई प्रिय नहीं, आप ही मेरे सुखके कारण हो, आप ही से मेरा आनन्द है ; इसलिये मैं चाहती हूँ, कि आप ही उस फलको खावेँ ।

दारोगा—अच्छा प्यारी ! आपकी आज्ञा सर आँबोंपर । मैं ही इसे खाऊँगा ; पर यह देव-दत्त वस्तु है, इसलिये पवित्र होकर खानी चाहिये । मैं अभी जाकर क्षिप्रामें ज्ञान करूँगा और इसे खा लूँगा ।

यह सुनते ही रानीने दारोगाको वह फल दे दिया । वह भी फल लेकर चलता हुआ । रानी उसे द्वार तक पहुँचा आई । दारोगा जाते-जाते राहमें सोचने लगा—“उस रण्डोको मैंने अच्छा चकमा दिया । मैं इस फलको खाऊँगा, तो क्या फायदा होगा ? यदि मैं अपनी आशनाको खिलाऊँगा, तो सच-मुच ही बड़ी लाभ होगा । मेरी प्राणप्यारी इसके खानेसे सदा आज जैसी ही रूपलावण्य-सम्पन्न नवयुवती बनी रहेगी और

बैराग्यशालक ४००

गमकद्वारा शरीर का शान्त हुआ बाह्यी अस्तों रानी के विदेश हुए अलमकद्वारा को अपनी प्रकृतिनी देवता को दे रही हैं।

वैराग्यगुरुक

एशिया की प्यारी देव्या उसी अमरकलश सेकर महादेव्या अनुहरि के सामने खड़ी है । वह उस कलशको महादेव्या को देवा कहती है ।

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“मैं सदा उसके साथ आनन्द उपभोग करूँगा।” यह सोचता हुआ वह अपनी आशाना—वेश्याके मकान पर जा पहुँचा। उस समय वह वेश्या एक तकिये के सहारे बैठी हुई थी। उसके चन्द्र यार उसकी सेवामें बैठे थे। दारोगा साहबको वेश्याने आदर से साधने बिठाया और आनेका कारण पूछा।

दारोगाने कहा—“प्रिये ! आज मुझे एक बहुत फल मिला है। इसको खानेवाला कभी बूढ़ा नहीं होता और मृत्यु उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकती। मैं चाहता हूँ, इस फल को तुम खाओ। तुम्हारे सदा-सर्वदा आज जैसी नव-युवती बनी रहनेसे मेरी जिन्दगी सुख से कटेगी।”

वेश्याने कहा,—“अच्छा प्यारे ! आपकी आज्ञाको मैं टाल नहीं सकती। मैं स्नान करके इस फल को खा लूँगी।”

वेश्याकी यह बात सुनते ही दारोगा ने वह अमर फल उसे दे दिया और आप अपने डेरे को चला आया। उसके जाते ही वेश्या सोचने लगी—“मुझे सारी उम्र पाप कमाते बीती। न जाने इतने पापोंका ही मुझे क्या-क्या दण्ड भोगना होगा ? यदि मैं इस फल को खाऊँगी, तो अमृतकाल तक इसी तरह पापोंकी गठरियाँ बटोरती रहूँगी ; अतः मुझे यह फल खाना हरगिज़ मुनासिब नहीं। इसे तो मेरे प्यारे महाराज भर्तृहरि खायँ तो अच्छा। उनके अजर अमर रहने से मेरी आत्माको सन्तोष होगा। ऐसे राजाके राज्यमें प्रजा सदा सुखी रहेगी। हमारे महाराज आदर्श राजा हैं। ऐसे राजा बहुत कम हैं।”

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यह सोचकर, वह कपड़े-लत्तोंसे टिचन हो, फल लेकर राज-सभाकी ओर चली। सभामें पड़ चुके ही चोपदार ने महाराज को झबर दी, कि एक बाईजी साहिबा तशरोफ लाई है। महा-राजने वेश्या को सामने बुलाया और उसके आनेका सबब पूछा।

• वेश्याने कहा—“महाराज! आज मुझे एक अपूर्व फल मिला है। यह फल अजीब तासीर रखता है। इसके खानेवाला सदा अमर रहता है। मैं इस फल को खाऊँगी, तो सदा पाप कमाऊँगी; इसलिये यह फल आप ही के खाने योग्य है। आप अजर अमर रहेंगे, तो पृथ्वी सुखी रहेगी।”

वेश्याके हाथमें उस फल को देख तथा उसकी बातें सुनकर महाराजके चेहरे का रंग उड़ गया। वह आश्चर्य्य चकित हो गये। ऊपर का साँस ऊपर और नीचे का साँस नीचे रह गया। वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो सोचमें पड़ गये। शेषमें; होश-हवाश ठिकाने आने पर, उन्होंने वह फल वेश्या के हाथसे ले लिया और धोकर खा गये।

परमात्माकी इच्छासे ही, वह फल मूमघामकर फिर राजाके पास पहुँचा। राजाने अनुसन्धान द्वारा सारा भेद जान लिया। उन्हें पिङ्गला के छल-छिद्र-युक्त कपट व्यवहार पर बड़ी घृणा उत्पन्न हो गई। उन्हें अपनी सबसे अधिक प्यारी रानीके दुर्व्यवहार और विश्वासघात से बड़ा दुःख हुआ। उनके दिल पर सङ्गत चोट लगी। मालूम हो गया, कि स्त्रियों की

ॐ नमः शिवाय ॥ १ ॥

महाभारतकालीन अर्जुन को संसार से विरक्ति हो गई है ; धर्म राजशाही अनशीलन प्रभृति को दुःखदायक परिस्थिति कर कर ही आ रहे हैं ।

This is a high-contrast, black-and-white photograph. On the left side, two fingers are visible, holding the edge of a white page. The page itself is mostly blank, with a few small, dark specks scattered across it. At the bottom of the image, there is a dark, horizontal strip that appears to be the edge of the page or a shadow. The overall image has a grainy, high-contrast quality.

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प्रतिमें सार नहीं; स्त्री-जातिकी मुहब्बत का कोई ठिकाना नहीं। उन्हें संसार से विरक्ति हो गई। उन्हें संसार और विषय-भोगोंसे एकदम नफरत हो गई। उन्होंने समझ लिया, संसारमें कोई किसीका नहीं है। यह मिथ्या जाल है। इसमें फँस कर लोग अपना दुष्प्राप्य जीवन बुथा खोते हैं। उन्होंने अपने तर्हें धिकारते हुए कहा—

“यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरका । साप्यन्यमिच्छति जनं सज्जोऽन्यसक्तः ॥ अस्मत्कृते च परिनुष्यति काचिदन्या । धिकं तां च तं च मदनं च इमां च मां च ॥”

मैं जिसको सदा चाहता हूँ, वह ( मेरी रानी पिंगला ) मुझे नहीं चाहती; वह दूसरे पुरुषको चाहती है ! वह पुरुष ( दागोगा ) रानो को नहीं चाहता; वह दूसरी ही स्त्री पर मरता है ! वह स्त्री जिसे रानीका यार दागोगा चाहता है, वह मुझे चाहती है ! इसलिए रानीको धिकार है ! उस दागोगाको धिकार है ! उस वेश्या को धिकार है ! मुझको धिकार है और उस कामदेव को धिकार है, जो ये सब काण्ड करता है ।

इस घटना से संसार महाराज के लिये बिल्कुल ही बुरा मालूम होने लगा। अपने प्रधान मंत्री को सामने बुला, राजका सारा काम उसे सम्हटा, अपनी राजसी पेशा क उतार कर उसे दे दी और