वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ २६ ]
बहुत कुछ तर्क-वितर्क और सोच-विचारके बाद ब्राह्मण- देवता भी इसी बात पर जम गये। उन्हें ब्राह्मणीकी बातही सोलह आने ठीक जची। इसलिये वह कपड़े पहन, फल हाथमें ले, महाराजकी सभामें पहुँचे। चोबदारने खबर दी। महाराजने उस ब्राह्मणको अपने निकट बुला लिया और पूछा—“देवता ! क्या चाहते हो ? आज्ञा कीजिये ; इसी क्षण आपकी आज्ञा पालन की जायगी।” ब्राह्मणने उस अमर फलकी सारी कहानी सुना- कर, वह फल राजाके हाथमें दे दिया। राजाने भी उसे खुशीसे ले लिया और ब्राह्मणको कई लक्ष सुवर्ण मुद्रा देनेका हुक्म दिया। ब्राह्मण अशरफियाँ लेकर हँसता-हँसता अपने घर आया।
अब महाराज मन-ही-मन विचार करने लगे—“वास्तवमें यह फल परमात्माने ही दिया करके मेरे पास भिजवाया है। पर अब यह समझमें नहीं आता, कि इस फलको मैं खाऊँ या अपनी प्राणप्रतिमा, प्राणाविका, प्राणप्रदा रानी पिङ्गलाको खिलाऊँ। अगर मैं इसे खाऊँगा, तो सदा अमर रहूँगा ; मेरा रूप-यौवन सदा स्थिर रहेगा ; दुःखदायी बुढ़ापा पास न आवेगा, पर मेरी प्यारी पिङ्गला, मेरे सुखोंकी मूल पिंगला तो कुछ दिन बाद ही बूढ़ी हो जायगी—उसका यह रूप-लावण्य नष्ट हो जायगा। उस दशामें, मैं किसके साथ सुख उपभोग करूँगा ? इसलिये मैं इसे पिंगलाको ही खिलाऊँगा। वह यदि अमर रहेगी, वह यदि बूढ़ी न होगी, यदि उसकी सौन्दर्य-प्रभा ज्यों की त्यों बनी रहेगी ; तो मैं उसीके साथ संसारी सुखोंका आनन्द