वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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उपभोग करूँगा। यह सोच और इस विचार पर दृढ़ हो, महाराजा फलको हाथमें लेकर रनवासको चल दिये।
महाराजके महलके द्वार पर पहुँचते ही दासियोंने जाकर महारानीको महाराजके आगमन की सूचना दी। पिङ्गला शीघ्रही तैयार हो, उन्हें लेनेके लिये द्वार तक आई और उनके गलेमें हाथ डाल उन्हें अन्दर लिवा ले गई। उन्हें एक परमोत्कृष्ट आसन पर बिठा आप भी उनकी बगलमें बैठ गई और अपने हाव-भाव और ताज़ीनख़रोंसे उनका मन अपने हाथमें करने लगी। शेषमें पूछा—“महाराज ! आज असमयमें इस दासी पर कैसे कृपा की ?” महाराजने कहा—“प्रिये ! आज एक अपूर्व फल मेरे हाथ लगा है। उसीको लेकर तुम्हारे पास आया हूँ।”
रानीने कहा—“महाराज ? वह फल मुझे दिखाइये और यह भी बताइये, उसमें ऐसा कौनसा गुण है, कि जिससे आप उसकी इतनी लम्बी-चौड़ी तारीफ करते हैं ?
राजाने कहा—“रानी ! यह फल, जिसे आप मेरे हाथमें देख रही हैं, “अमरफल” है। इसे एक देवताने एक ब्राह्मणको उसके तपसे सन्तुष्ट होकर दिया था। ब्राह्मणने इसे मुझे दिया। इसमें यह गुण है, कि इसका खानेवाला न कभी बूढ़ा होता और न कभी मरता है ; सदा नौजवान रहता है। मैं चाहता हूँ कि इस फलको तुम खाओ, जिससे तुम सदा नवयुवती बनी रहो—तुम्हारा रूपलावण्य सदा आज जैसा ही बना रहे।” यह कहकर राजाने वह अमर फल रानीके हाथमें दे दिया।