भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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प्रतिमें सार नहीं; स्त्री-जातिकी मुहब्बत का कोई ठिकाना नहीं। उन्हें संसार से विरक्ति हो गई। उन्हें संसार और विषय-भोगोंसे एकदम नफरत हो गई। उन्होंने समझ लिया, संसारमें कोई किसीका नहीं है। यह मिथ्या जाल है। इसमें फँस कर लोग अपना दुष्प्राप्य जीवन बुथा खोते हैं। उन्होंने अपने तर्हें धिकारते हुए कहा—

“यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरका । साप्यन्यमिच्छति जनं सज्जोऽन्यसक्तः ॥ अस्मत्कृते च परिनुष्यति काचिदन्या । धिकं तां च तं च मदनं च इमां च मां च ॥”

मैं जिसको सदा चाहता हूँ, वह ( मेरी रानी पिंगला ) मुझे नहीं चाहती; वह दूसरे पुरुषको चाहती है ! वह पुरुष ( दागोगा ) रानो को नहीं चाहता; वह दूसरी ही स्त्री पर मरता है ! वह स्त्री जिसे रानीका यार दागोगा चाहता है, वह मुझे चाहती है ! इसलिए रानीको धिकार है ! उस दागोगाको धिकार है ! उस वेश्या को धिकार है ! मुझको धिकार है और उस कामदेव को धिकार है, जो ये सब काण्ड करता है ।

इस घटना से संसार महाराज के लिये बिल्कुल ही बुरा मालूम होने लगा। अपने प्रधान मंत्री को सामने बुला, राजका सारा काम उसे सम्हटा, अपनी राजसी पेशा क उतार कर उसे दे दी और