वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ )
‘भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं चित्ते तृपालाद्भयम् । मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम् ॥ शास्त्रे वादभयं गुणो खलभयं काये कृत्तान्ताद् भयम् । सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि तृष्णां वैराग्यमेवाभयम् ॥
“अहो वा हारे वा बलवति रिपौ वा सुहृदि वा । मयां वा लोटे वा कुसुमशयने वा दषदि वा ।। तृणे वा झैणे वा मम समदृशो यांतु दिवसाः । कचित्गुण्यारये शिवशिवशिवेति प्रलपतः ॥”
“विषयो के भोगने में रोगों का भय है, कुल में दोष होनेका भय है, धनमें राजका भय है, नृप रहनेमें दीनताका भय है, बलमें शत्रुओंका भय है, सौन्दर्यमें बुढ़ापे का भय है, गुणों में दुष्टोंका भय है, शरीरमें मोतका भय है, संसारकी सभी चीजों में मनुष्यको भय है, केवल “वैराग्य” में किसी प्रकार का भय नहीं है ।
“हे परमात्मन् ! मेरे शेष दिन किसी पवित्र वनमें शिव-शिव रहते बितें’ ; सर्प और पुष्पहार, बलवान् शत्रु और मित्र, कोमल पुष्प-शय्या और पत्थरकी शिला, मणि और पत्थर, तिनका और सुन्दरी स्त्रियोंके समूहमें मेरी दृष्टि एकसी हो जाय—यही मेरी इच्छा है ।”
यह कहते हुए आपने सारा राज-पाट धन-दौलत प्रभृति एक क्षणमें त्याग कर वनका रास्ता लिया । चलते समय