वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३७ )
उन्होंने मन्त्रीसे और भी कहा,—“मैंने अपने धर्मात्मा और सत्यवादी सहोदर भाई विक्रमके साथ बड़ा अन्याय किया ! उस समय मेरी अकृ पर पर्दा पड़ा हुआ था। सुखे उचित-अनुचितका ज़रा भी ज्ञान नहीं था। उस कुलटाने मुझ पर जादू सा कर दिया था। मैं अब संसारके लोगोंको सलाह देता हूँ कि, वे अगर सुखसे जीवन बिताना चाहें, तो लियोंका विश्वास न करें और जो परमपदके अभिलाषी हों, वे तो उनका नाम भी न लें। मन्त्रीवर ! आप विक्रमका पता लगाना। यदि वह मिल जाय, तो उसे राजगद्दी पर बिठा देना।”
यदि महाराज भर्तृहरि चाहते, तो रानी पिङ्गलाको जीती ही ज़मीनमें गड़वा देते, उस दारोगाको तोपके मुँहसे बँधवा कर उड़वा देते तथा और शादी कर लेते ; पर आपको तो निर्मल ज्ञान हो गया था, आप संसारकी असलियतको-समझ गये थे, इसीसे आपको संसारसे घृणा हो गई। आपने उप-भोग, वस्त्र, चन्दन, वनित, रत्न और राज-पाट सबको तृणके समान समझ कर एक क्षणमें त्याग दिया। ऐसा सब किसी से नहीं हो सकता। ऐसा उनसे ही होता है, जिन पर जगदीशकी दया होती है या पूर्व संचित पुण्योंका उदय होता है। मनुष्यसे फूटे-टूटे हाँडी बतैन और गुदड़े ही नहीं छोड़े जाते, कोरी इच्छाओंका भी त्याग नहीं होता, तब राजपाट और धन-दौलतका छोड़ना तो बड़ी बात है।