भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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यह सोचकर, वह कपड़े-लत्तोंसे टिचन हो, फल लेकर राज-सभाकी ओर चली। सभामें पड़ चुके ही चोपदार ने महाराज को झबर दी, कि एक बाईजी साहिबा तशरोफ लाई है। महा-राजने वेश्या को सामने बुलाया और उसके आनेका सबब पूछा।

• वेश्याने कहा—“महाराज! आज मुझे एक अपूर्व फल मिला है। यह फल अजीब तासीर रखता है। इसके खानेवाला सदा अमर रहता है। मैं इस फल को खाऊँगी, तो सदा पाप कमाऊँगी; इसलिये यह फल आप ही के खाने योग्य है। आप अजर अमर रहेंगे, तो पृथ्वी सुखी रहेगी।”

वेश्याके हाथमें उस फल को देख तथा उसकी बातें सुनकर महाराजके चेहरे का रंग उड़ गया। वह आश्चर्य्य चकित हो गये। ऊपर का साँस ऊपर और नीचे का साँस नीचे रह गया। वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो सोचमें पड़ गये। शेषमें; होश-हवाश ठिकाने आने पर, उन्होंने वह फल वेश्या के हाथसे ले लिया और धोकर खा गये।

परमात्माकी इच्छासे ही, वह फल मूमघामकर फिर राजाके पास पहुँचा। राजाने अनुसन्धान द्वारा सारा भेद जान लिया। उन्हें पिङ्गला के छल-छिद्र-युक्त कपट व्यवहार पर बड़ी घृणा उत्पन्न हो गई। उन्हें अपनी सबसे अधिक प्यारी रानीके दुर्व्यवहार और विश्वासघात से बड़ा दुःख हुआ। उनके दिल पर सङ्गत चोट लगी। मालूम हो गया, कि स्त्रियों की