भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३३ )

“मैं सदा उसके साथ आनन्द उपभोग करूँगा।” यह सोचता हुआ वह अपनी आशाना—वेश्याके मकान पर जा पहुँचा। उस समय वह वेश्या एक तकिये के सहारे बैठी हुई थी। उसके चन्द्र यार उसकी सेवामें बैठे थे। दारोगा साहबको वेश्याने आदर से साधने बिठाया और आनेका कारण पूछा।

दारोगाने कहा—“प्रिये ! आज मुझे एक बहुत फल मिला है। इसको खानेवाला कभी बूढ़ा नहीं होता और मृत्यु उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकती। मैं चाहता हूँ, इस फल को तुम खाओ। तुम्हारे सदा-सर्वदा आज जैसी नव-युवती बनी रहनेसे मेरी जिन्दगी सुख से कटेगी।”

वेश्याने कहा,—“अच्छा प्यारे ! आपकी आज्ञाको मैं टाल नहीं सकती। मैं स्नान करके इस फल को खा लूँगी।”

वेश्याकी यह बात सुनते ही दारोगा ने वह अमर फल उसे दे दिया और आप अपने डेरे को चला आया। उसके जाते ही वेश्या सोचने लगी—“मुझे सारी उम्र पाप कमाते बीती। न जाने इतने पापोंका ही मुझे क्या-क्या दण्ड भोगना होगा ? यदि मैं इस फल को खाऊँगी, तो अमृतकाल तक इसी तरह पापोंकी गठरियाँ बटोरती रहूँगी ; अतः मुझे यह फल खाना हरगिज़ मुनासिब नहीं। इसे तो मेरे प्यारे महाराज भर्तृहरि खायँ तो अच्छा। उनके अजर अमर रहने से मेरी आत्माको सन्तोष होगा। ऐसे राजाके राज्यमें प्रजा सदा सुखी रहेगी। हमारे महाराज आदर्श राजा हैं। ऐसे राजा बहुत कम हैं।”