भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

[ ३२ ]

पल्लगपर बैठकर, आप उसकी गोदमें पड़ गईं और उसे प्यार करने लगीं।

दारोगाने पूछा—“रानी साहिवा ! आज यह गुलाम असमयमें ही क्यों याद किया गया ? क्या बात है ?”

रानी—प्यारे ! आज महाराजने मुझे एक फल दिया है । उसके खानेसे मनुष्य अमर बना रहता है, जवानी सदा स्थिर रहती है, बुढ़ापा कभी नहीं आता । राजा साहब मुझसे उस फलके खानेको कह गये हैं । मैंने उनसे वादा भी कर लिया है । पर, प्राणाधार ! संसारमें मुझे आपसे अधिक कोई प्रिय नहीं, आप ही मेरे सुखके कारण हो, आप ही से मेरा आनन्द है ; इसलिये मैं चाहती हूँ, कि आप ही उस फलको खावेँ ।

दारोगा—अच्छा प्यारी ! आपकी आज्ञा सर आँबोंपर । मैं ही इसे खाऊँगा ; पर यह देव-दत्त वस्तु है, इसलिये पवित्र होकर खानी चाहिये । मैं अभी जाकर क्षिप्रामें ज्ञान करूँगा और इसे खा लूँगा ।

यह सुनते ही रानीने दारोगाको वह फल दे दिया । वह भी फल लेकर चलता हुआ । रानी उसे द्वार तक पहुँचा आई । दारोगा जाते-जाते राहमें सोचने लगा—“उस रण्डोको मैंने अच्छा चकमा दिया । मैं इस फलको खाऊँगा, तो क्या फायदा होगा ? यदि मैं अपनी आशनाको खिलाऊँगा, तो सच-मुच ही बड़ी लाभ होगा । मेरी प्राणप्यारी इसके खानेसे सदा आज जैसी ही रूपलावण्य-सम्पन्न नवयुवती बनी रहेगी और