भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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[ ३१ ]

रानी उस फलको हाथमें लेकर कहने लगी,—“नहीं, प्राण-नाथ ! आप ही इस फलको खायें ; क्योंकि आप ही मेरी माँगके सिन्दूर हैं, आप ही से मेरा सौभाग्य है, आप ही मेरे सूर्य और चाँद हैं, आप हमसे मुझे जगत्में उजियाला हैं ।” परमात्मा आपको सदा अजर-अमर रखे, इसीमें मेरा सुख-सौभाग्य है ; रानीकी ये बातें बनावटी थीं । मुँहमें राम और बगलमें छुरीवाली बात थी । उसके पेटमें कपटकी कतरनी चल रही थी । राजा उसके जालमें पूर्णरूपसे फँसे हुए थे, इसलिये वह उसके फरेबोंको कैसे समझ सकते थे ? उन्होंने फिर कहा—“नहीं, यह फल तुमको ही खाना होगा । तुम्हारे फल खानेसे ही मुझे सन्तोष होगा ।” रानी तो यह चाहती ही थी, कि फलको राजा न खावे और वह मेरे हाथमें रहे ; इसलिये रोपमें वह राजी होगई और कहने लगी—“आपकी आज्ञाको मैं उल्लङ्घन नहीं कर सकती । जिसमें आप राजी उसीमें मैं राजी हूँ । आपके ही सन्तोषमें मुझे सन्तोष है । आपका जब यही हुक्म है, तो मैं ही इस फलको खाऊँगी ; पर यह देवता का दिया हुआ है, इसलिये इसे अशुद्ध अवस्थामें न खाऊँगी । ज्ञान-ध्यान पूजा-पाठ करके खाऊँगी ।” राजा उस मक्काराकी बात पर राजी हो गये और फल उसे देकर सभामें लौटआये ।

राजाके पीठ फेरते ही, रानीने दासी भेजकर, अपने उपपति—अस्तबलके दारोगाको बुला भेजा । वह शौतान सन्देशा पाते ही दौड़ा चला आया । रानी उसे लेनेको दरवाजे पर पहुँची और उसके गलेमें हाथ डालकर महलमें ले आई । उसे मक्कमली