वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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रानी उस फलको हाथमें लेकर कहने लगी,—“नहीं, प्राण-नाथ ! आप ही इस फलको खायें ; क्योंकि आप ही मेरी माँगके सिन्दूर हैं, आप ही से मेरा सौभाग्य है, आप ही मेरे सूर्य और चाँद हैं, आप हमसे मुझे जगत्में उजियाला हैं ।” परमात्मा आपको सदा अजर-अमर रखे, इसीमें मेरा सुख-सौभाग्य है ; रानीकी ये बातें बनावटी थीं । मुँहमें राम और बगलमें छुरीवाली बात थी । उसके पेटमें कपटकी कतरनी चल रही थी । राजा उसके जालमें पूर्णरूपसे फँसे हुए थे, इसलिये वह उसके फरेबोंको कैसे समझ सकते थे ? उन्होंने फिर कहा—“नहीं, यह फल तुमको ही खाना होगा । तुम्हारे फल खानेसे ही मुझे सन्तोष होगा ।” रानी तो यह चाहती ही थी, कि फलको राजा न खावे और वह मेरे हाथमें रहे ; इसलिये रोपमें वह राजी होगई और कहने लगी—“आपकी आज्ञाको मैं उल्लङ्घन नहीं कर सकती । जिसमें आप राजी उसीमें मैं राजी हूँ । आपके ही सन्तोषमें मुझे सन्तोष है । आपका जब यही हुक्म है, तो मैं ही इस फलको खाऊँगी ; पर यह देवता का दिया हुआ है, इसलिये इसे अशुद्ध अवस्थामें न खाऊँगी । ज्ञान-ध्यान पूजा-पाठ करके खाऊँगी ।” राजा उस मक्काराकी बात पर राजी हो गये और फल उसे देकर सभामें लौटआये ।
राजाके पीठ फेरते ही, रानीने दासी भेजकर, अपने उपपति—अस्तबलके दारोगाको बुला भेजा । वह शौतान सन्देशा पाते ही दौड़ा चला आया । रानी उसे लेनेको दरवाजे पर पहुँची और उसके गलेमें हाथ डालकर महलमें ले आई । उसे मक्कमली
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पल्लगपर बैठकर, आप उसकी गोदमें पड़ गईं और उसे प्यार करने लगीं।
दारोगाने पूछा—“रानी साहिवा ! आज यह गुलाम असमयमें ही क्यों याद किया गया ? क्या बात है ?”
रानी—प्यारे ! आज महाराजने मुझे एक फल दिया है । उसके खानेसे मनुष्य अमर बना रहता है, जवानी सदा स्थिर रहती है, बुढ़ापा कभी नहीं आता । राजा साहब मुझसे उस फलके खानेको कह गये हैं । मैंने उनसे वादा भी कर लिया है । पर, प्राणाधार ! संसारमें मुझे आपसे अधिक कोई प्रिय नहीं, आप ही मेरे सुखके कारण हो, आप ही से मेरा आनन्द है ; इसलिये मैं चाहती हूँ, कि आप ही उस फलको खावेँ ।
दारोगा—अच्छा प्यारी ! आपकी आज्ञा सर आँबोंपर । मैं ही इसे खाऊँगा ; पर यह देव-दत्त वस्तु है, इसलिये पवित्र होकर खानी चाहिये । मैं अभी जाकर क्षिप्रामें ज्ञान करूँगा और इसे खा लूँगा ।
यह सुनते ही रानीने दारोगाको वह फल दे दिया । वह भी फल लेकर चलता हुआ । रानी उसे द्वार तक पहुँचा आई । दारोगा जाते-जाते राहमें सोचने लगा—“उस रण्डोको मैंने अच्छा चकमा दिया । मैं इस फलको खाऊँगा, तो क्या फायदा होगा ? यदि मैं अपनी आशनाको खिलाऊँगा, तो सच-मुच ही बड़ी लाभ होगा । मेरी प्राणप्यारी इसके खानेसे सदा आज जैसी ही रूपलावण्य-सम्पन्न नवयुवती बनी रहेगी और
बैराग्यशालक ४००
गमकद्वारा शरीर का शान्त हुआ बाह्यी अस्तों रानी के विदेश हुए अलमकद्वारा को अपनी प्रकृतिनी देवता को दे रही हैं।
वैराग्यगुरुक
एशिया की प्यारी देव्या उसी अमरकलश सेकर महादेव्या अनुहरि के सामने खड़ी है । वह उस कलशको महादेव्या को देवा कहती है ।
( ३३ )
“मैं सदा उसके साथ आनन्द उपभोग करूँगा।” यह सोचता हुआ वह अपनी आशाना—वेश्याके मकान पर जा पहुँचा। उस समय वह वेश्या एक तकिये के सहारे बैठी हुई थी। उसके चन्द्र यार उसकी सेवामें बैठे थे। दारोगा साहबको वेश्याने आदर से साधने बिठाया और आनेका कारण पूछा।
दारोगाने कहा—“प्रिये ! आज मुझे एक बहुत फल मिला है। इसको खानेवाला कभी बूढ़ा नहीं होता और मृत्यु उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकती। मैं चाहता हूँ, इस फल को तुम खाओ। तुम्हारे सदा-सर्वदा आज जैसी नव-युवती बनी रहनेसे मेरी जिन्दगी सुख से कटेगी।”
वेश्याने कहा,—“अच्छा प्यारे ! आपकी आज्ञाको मैं टाल नहीं सकती। मैं स्नान करके इस फल को खा लूँगी।”
वेश्याकी यह बात सुनते ही दारोगा ने वह अमर फल उसे दे दिया और आप अपने डेरे को चला आया। उसके जाते ही वेश्या सोचने लगी—“मुझे सारी उम्र पाप कमाते बीती। न जाने इतने पापोंका ही मुझे क्या-क्या दण्ड भोगना होगा ? यदि मैं इस फल को खाऊँगी, तो अमृतकाल तक इसी तरह पापोंकी गठरियाँ बटोरती रहूँगी ; अतः मुझे यह फल खाना हरगिज़ मुनासिब नहीं। इसे तो मेरे प्यारे महाराज भर्तृहरि खायँ तो अच्छा। उनके अजर अमर रहने से मेरी आत्माको सन्तोष होगा। ऐसे राजाके राज्यमें प्रजा सदा सुखी रहेगी। हमारे महाराज आदर्श राजा हैं। ऐसे राजा बहुत कम हैं।”
३
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यह सोचकर, वह कपड़े-लत्तोंसे टिचन हो, फल लेकर राज-सभाकी ओर चली। सभामें पड़ चुके ही चोपदार ने महाराज को झबर दी, कि एक बाईजी साहिबा तशरोफ लाई है। महा-राजने वेश्या को सामने बुलाया और उसके आनेका सबब पूछा।
• वेश्याने कहा—“महाराज! आज मुझे एक अपूर्व फल मिला है। यह फल अजीब तासीर रखता है। इसके खानेवाला सदा अमर रहता है। मैं इस फल को खाऊँगी, तो सदा पाप कमाऊँगी; इसलिये यह फल आप ही के खाने योग्य है। आप अजर अमर रहेंगे, तो पृथ्वी सुखी रहेगी।”
वेश्याके हाथमें उस फल को देख तथा उसकी बातें सुनकर महाराजके चेहरे का रंग उड़ गया। वह आश्चर्य्य चकित हो गये। ऊपर का साँस ऊपर और नीचे का साँस नीचे रह गया। वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो सोचमें पड़ गये। शेषमें; होश-हवाश ठिकाने आने पर, उन्होंने वह फल वेश्या के हाथसे ले लिया और धोकर खा गये।
परमात्माकी इच्छासे ही, वह फल मूमघामकर फिर राजाके पास पहुँचा। राजाने अनुसन्धान द्वारा सारा भेद जान लिया। उन्हें पिङ्गला के छल-छिद्र-युक्त कपट व्यवहार पर बड़ी घृणा उत्पन्न हो गई। उन्हें अपनी सबसे अधिक प्यारी रानीके दुर्व्यवहार और विश्वासघात से बड़ा दुःख हुआ। उनके दिल पर सङ्गत चोट लगी। मालूम हो गया, कि स्त्रियों की
ॐ नमः शिवाय ॥ १ ॥
महाभारतकालीन अर्जुन को संसार से विरक्ति हो गई है ; धर्म राजशाही अनशीलन प्रभृति को दुःखदायक परिस्थिति कर कर ही आ रहे हैं ।
This is a high-contrast, black-and-white photograph. On the left side, two fingers are visible, holding the edge of a white page. The page itself is mostly blank, with a few small, dark specks scattered across it. At the bottom of the image, there is a dark, horizontal strip that appears to be the edge of the page or a shadow. The overall image has a grainy, high-contrast quality.
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प्रतिमें सार नहीं; स्त्री-जातिकी मुहब्बत का कोई ठिकाना नहीं। उन्हें संसार से विरक्ति हो गई। उन्हें संसार और विषय-भोगोंसे एकदम नफरत हो गई। उन्होंने समझ लिया, संसारमें कोई किसीका नहीं है। यह मिथ्या जाल है। इसमें फँस कर लोग अपना दुष्प्राप्य जीवन बुथा खोते हैं। उन्होंने अपने तर्हें धिकारते हुए कहा—
“यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरका । साप्यन्यमिच्छति जनं सज्जोऽन्यसक्तः ॥ अस्मत्कृते च परिनुष्यति काचिदन्या । धिकं तां च तं च मदनं च इमां च मां च ॥”
मैं जिसको सदा चाहता हूँ, वह ( मेरी रानी पिंगला ) मुझे नहीं चाहती; वह दूसरे पुरुषको चाहती है ! वह पुरुष ( दागोगा ) रानो को नहीं चाहता; वह दूसरी ही स्त्री पर मरता है ! वह स्त्री जिसे रानीका यार दागोगा चाहता है, वह मुझे चाहती है ! इसलिए रानीको धिकार है ! उस दागोगाको धिकार है ! उस वेश्या को धिकार है ! मुझको धिकार है और उस कामदेव को धिकार है, जो ये सब काण्ड करता है ।
इस घटना से संसार महाराज के लिये बिल्कुल ही बुरा मालूम होने लगा। अपने प्रधान मंत्री को सामने बुला, राजका सारा काम उसे सम्हटा, अपनी राजसी पेशा क उतार कर उसे दे दी और
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‘भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं चित्ते तृपालाद्भयम् । मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम् ॥ शास्त्रे वादभयं गुणो खलभयं काये कृत्तान्ताद् भयम् । सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि तृष्णां वैराग्यमेवाभयम् ॥
“अहो वा हारे वा बलवति रिपौ वा सुहृदि वा । मयां वा लोटे वा कुसुमशयने वा दषदि वा ।। तृणे वा झैणे वा मम समदृशो यांतु दिवसाः । कचित्गुण्यारये शिवशिवशिवेति प्रलपतः ॥”
“विषयो के भोगने में रोगों का भय है, कुल में दोष होनेका भय है, धनमें राजका भय है, नृप रहनेमें दीनताका भय है, बलमें शत्रुओंका भय है, सौन्दर्यमें बुढ़ापे का भय है, गुणों में दुष्टोंका भय है, शरीरमें मोतका भय है, संसारकी सभी चीजों में मनुष्यको भय है, केवल “वैराग्य” में किसी प्रकार का भय नहीं है ।
“हे परमात्मन् ! मेरे शेष दिन किसी पवित्र वनमें शिव-शिव रहते बितें’ ; सर्प और पुष्पहार, बलवान् शत्रु और मित्र, कोमल पुष्प-शय्या और पत्थरकी शिला, मणि और पत्थर, तिनका और सुन्दरी स्त्रियोंके समूहमें मेरी दृष्टि एकसी हो जाय—यही मेरी इच्छा है ।”
यह कहते हुए आपने सारा राज-पाट धन-दौलत प्रभृति एक क्षणमें त्याग कर वनका रास्ता लिया । चलते समय
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उन्होंने मन्त्रीसे और भी कहा,—“मैंने अपने धर्मात्मा और सत्यवादी सहोदर भाई विक्रमके साथ बड़ा अन्याय किया ! उस समय मेरी अकृ पर पर्दा पड़ा हुआ था। सुखे उचित-अनुचितका ज़रा भी ज्ञान नहीं था। उस कुलटाने मुझ पर जादू सा कर दिया था। मैं अब संसारके लोगोंको सलाह देता हूँ कि, वे अगर सुखसे जीवन बिताना चाहें, तो लियोंका विश्वास न करें और जो परमपदके अभिलाषी हों, वे तो उनका नाम भी न लें। मन्त्रीवर ! आप विक्रमका पता लगाना। यदि वह मिल जाय, तो उसे राजगद्दी पर बिठा देना।”
यदि महाराज भर्तृहरि चाहते, तो रानी पिङ्गलाको जीती ही ज़मीनमें गड़वा देते, उस दारोगाको तोपके मुँहसे बँधवा कर उड़वा देते तथा और शादी कर लेते ; पर आपको तो निर्मल ज्ञान हो गया था, आप संसारकी असलियतको-समझ गये थे, इसीसे आपको संसारसे घृणा हो गई। आपने उप-भोग, वस्त्र, चन्दन, वनित, रत्न और राज-पाट सबको तृणके समान समझ कर एक क्षणमें त्याग दिया। ऐसा सब किसी से नहीं हो सकता। ऐसा उनसे ही होता है, जिन पर जगदीशकी दया होती है या पूर्व संचित पुण्योंका उदय होता है। मनुष्यसे फूटे-टूटे हाँडी बतैन और गुदड़े ही नहीं छोड़े जाते, कोरी इच्छाओंका भी त्याग नहीं होता, तब राजपाट और धन-दौलतका छोड़ना तो बड़ी बात है।
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महाराजा भर्तृहरि भूपालोंमें आदर्श भूपाल हो गये हैं। उन्होंने जो किया है वह शायद ही कोई भूपाल उनके बाद कर सका हो । जब तक सूर्य्य चन्द्रमा रहेगे, जब तक यह दुनिया रहेगी, तब तक महाराजका प्रातःस्मरणीय पुण्यश्लोक नाम लोगोंकी ज़बान पर रहेगा ।
हमने महाराजा भर्तृहरि और महाराजा विक्रमादित्यके सम्बन्धमें जो कुछ लिखा है, वह एक थियेट्रिकल कम्पनीके तमाशे और एक पुरानी पुस्तकके आधार पर लिखा है, जो हमने, कोई २५ साल पहले, एक पलटनकी लाइब्रेरीमें अज़ारेज़ो और हिन्दीमें देखी थी। इमें जो याद था वही लिखा है। इस समय न तो हमारे पास वह पुस्तक ही है और न हमें उसका नाम ही याद है।
A high-contrast, black and white photograph. On the right side, a person's hand is visible, holding a thin, light-colored object (possibly a needle or thread) between the thumb and index finger. The hand is positioned against a dark, textured background. The left side of the image is a bright, white area, which appears to be a page or a surface. There are several small, dark specks scattered across the white area, particularly near the top and bottom edges. The overall composition is minimalist and focuses on the interaction between the hand and the object.
भारतभूमि
शैप के मुख में मेंडक है, मौन में कमर नहीं है ; तथापि मेंडक मछली को खाया चाहता है ; बस यही हालत सनारी मोहाण्यों की है । वे हर नव्य मौत के मुख में रहते हुए भी, मेंडक की तरह विषकों को भोगने की चेष्टा करते हैं ।
॥ श्रीः ॥
भर्तृ हरिकृत
वैराग्य शतक
दिकालाद्यनवच्छिन्नाजन्तचिन्मात्रमूर्तये ।
स्वातुभूयैकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ॥१॥
जो दशों दिशाओं और तीनों कालोंमें परिपूर्ण है, जो अनन्त है, जो चैतन्य-स्वरूप है, जो अपने ही अनुभवसे जाना जा सकता है, जो शान्त और तेजोमय है, ऐसे ब्रह्म रूप परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१॥
जो परमेश्वर पूरब पच्छिम प्रभृति दशों दिशाओं एवं भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल,—इनसे संकुचित नहीं है ; यानी जो सब दिशाओं और तीनों कालोंमें मौजूद रहता है, किसी दिशा और किसी कालको केंद्रमें नहीं है, जो तीनों लोक
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और चौदहों भुवनोंमें व्याप रहा है, जो पहले भी था, अब भी है और आगे आनेवाले समयमें भी रहेगा, इसलिये वह अनन्त है, उसका विनाश नहीं है, वह चैतन्य स्वरूप है, वह केवल अपने ही अनुभवसे जाना जा सकता है, वह परम शान्त और तेजोरूप है, उसीको मैं वन्दना करता हूँ ।
1. To One unlimited by time or space, to the Boundless, to Him who is all consciousness, to one who is know-able only by self-contemplation and to the Supreme Peace and Light I bow down in prayer.
बोद्धारो मत्सरधन्ताः प्रभवः स्मयद्भूषिताः ।
अबोयोपहताश्चान्ये जीर्णर्मिगे सुभाषितम् ॥२॥
जो विद्वान् हैं, वे ईर्षासे भरे हुए हैं ; जो धनवान् हैं, उनके आपने धनका गर्व है ; इनके सिवा जो और लोग हैं, वे अज्ञानी हैं ; इसलिये विद्वत्तापूर्ण विचार, सुन्दर-सुन्दर सारगर्भित निबन्ध या उत्तम काव्य शरीरमें ही नाश हो जाते हैं ॥२॥
खुलासा ।
जो विद्वान् हैं, पण्डित हैं, जिन्हें अच्छे-बुरेका ज्ञान या तमीज है, वे तो अपनी विद्वत्ताके अभिमानसे मतवाले हो रहे हैं, वे दूसरोंके उत्तम-से-उत्तम कामोंमें छिद्रान्वेषण करने या नुकताचीनी करनेमें ही अपना पाण्डित्य समझते हैं ; अतः ऐसोंसे कुछ कहनेमें ठामको ज़रा भी सम्भावना नहीं ।
( ३ )
दूसरे प्रकारके लोग जो धनी हैं, वे अपने धनके गर्वसे भुले हुए हैं। उन्हें धन-भदके कारण कुछ सूझता ही नहीं, उन्हें किसीसे बातें करना या किसीको सुनना ही पसन्द नहीं ; अतः उनसे भी कुछ लाभ नहीं। अब रहे तीसरे प्रकारके लोग ; वे नितान्त मूर्ख या अज्ञानी हैं ; उन गँवारोंमें अच्छे-बुरेकी तमीज नहीं, अतः उनसे कुछ कहने या अपनी कृति दिखाने सुनानेको दिल नहीं चाहता ; इसलिये हमारे मुँहसे निकल सकनेवाले उत्तमोत्तम विचार, निबन्ध, काव्य या सुभाषित संसारके सामने न आकर, हमारे शरीरमें ही नष्ट हुए जाते हैं, हमारा परिश्रम व्यर्थ जाता है और संसार हमारे कामके देखने और लाभान्वित होनेसे वञ्चित रहता है !
और भी स्पष्ट ।
संसारमें धमण्डियोंकी संख्या बहुत है। कितने हो अपनी विद्याके गर्वसे चूर हो रहे हैं और कितने हो लक्ष्मीके नशे से मतवाले हो रहे हैं। यदि कोई विद्वान् या कारीगर विद्या-गर्वियोंके पास जाता है, तो अब्बल तो वे धुरन्धर विद्वान् बेचारेको पास ही नहीं फटकने देते और यदि कोई श्रीचरणों में पहुँच गया, तो वे उसके कामके उत्तम अंशों पर ध्यान न देकर, बुरे अंशोंको देखते हैं और उसमें तरह-तरहके दोष निकालकर उसके दिलको चोट पहुँचाते हैं ; इसलिये ऐसे विद्या-गर्वियोंके पास जाना और अपने कामकी कुरददानी
( ४ )
की आज्ञा करना भूल है। अब रहे धन-गन्वों ; धनसे मतवालों की तो बात ही न पूछिये। प्रथम तो उन तक पहुँचना ही कठिन काम है। यदि पहुँच भी गये, तो उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता। सैकड़ों बार उनकी देहलकी धूल चाटने पर कदा-चित् ही कभी नम्बर आवे-तो-आवे। फिर ; वहाँ पराई बुराई करनेवालों या जुगलझोरोंकी तूती बोलती है, अतः वहाँ भी सफलता नहीं होती। इन दोनों प्रकारके लोगोंके सिवा, जो तीसरे प्रकारके लोग हैं, वे तो निरं मूर्ख—अज्ञानी या कोरे बाबाजी हैं। उनको किसी प्रकारका ज्ञान ही नहीं, वे सुभाषित और कुभाषित, सुशिक्षा और कुशिक्षा, काव्य और अलङ्कार को समझते ही नहीं। ऐसी दशामें क्रूरदान या गुणप्राहक के अभावसे खामुखाह मनमें विरक्ति या वेदना होती है। मन दुःखी होकर कहता है—“हाय ! रसिक और समझदारोंके दिल-साफ नहीं हैं, उनके चित्त मत्सरतासे कलुषित हो रहे हैं। धनवानोंको धनके नशेके मारे कुछ सूझता ही नहीं, वे किसीसे बात ही नहीं करते। अज्ञानियोंकी समझमें कुछ आ नहीं सकता। अब हम अपना पाण्डित्य या कायीगरी कित्ते दिखावे ?
शिक्षा—जो तुम्हारी तरफ मुखातिब हों, तुम्हारी बातों पर काम द, तुम्हारी बातोंको ध्यानसे सुनें, उन्हींको अपनी बातें सुनाओ। जो तुम्हारी बातें सुनना न चाहें, उनके गले मत पड़ें। ऐसा करनेसे आपकी आत्म-प्रतिष्ठामें बड़ा लगेगा—आपका अपमान होगा।
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कुरडलिया ।
परिडत मत्सरता भरे, भूष भरे अभिमान । और जीव या जगतके, मूरख महाअजान ॥ मूरख महा अजान, देखके संकट सहिये । द्वन्द्व प्रबन्ध कवित्त, कान्यरस कासों कहिये ॥ वृद्ध भई मनभैंहि, मधुर बाणी गुणमण्डित । अपने मनको मार, मौन घर बैठत परिडत ॥२॥
2 The learned are full of jealousy; the wealthy are intoxicated with vanity; while others are in the hold of ignorance. Hence there is no other resource for one's literary talents save that of their being suffocated within one's own self.
न संसारोत्पन्नं चरितमनुपर्यामि कुशलं । विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः ॥ महद्भिः पुण्यो वैश्चिपरिगृहीताश्च विषया । महान्तो जायन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम् ॥३॥
मुझे संसारी कामोंमें जरा सुख नहीं दीखता। मेरी रायमें तो पुण्यफल भी भयदायक ही हैं। इसके सिवा, बहुतसे अच्छे-अच्छे पुण्यकर्म करनेसे जो विषय-सुखके सामान प्राप्त किये और चिरकाल
( ६ )
तक भोगे गये हैं, वे भी विषय-सुख चाहनेवालेको, अन्त समयमें, दुःखोंके ही कारण होते हैं ॥३॥
खुलासा ।
इस जीवनमें सुखका लेश भी नहीं है। जिनके पास अक्षय लक्ष्मी, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, मोटर, नौकर-चाकर, रथ-पालकी प्रभृति सभी सुखके सामान मौजूद हैं, राजा भी जिनकी बातको टाल नहीं सकता, जिनके इशारोंसे ही लोगों का भला या बुरा हो सकता है, ऐसे सर्वसुख-सम्पन्न लोग भी, चाहे ऊपरसे सुखी दीखते हों, पर वास्तवमें सुखी नहीं हैं; भीतर-ही-भीतर उन्हें भी घुन खाये जाता है; किसी न किसी दुःखसे वे जर्जरित हुए जाते हैं। इस मौकेकी दो कहानियाँ हमें याद आई हैं। हम उन्हें दृष्टान्तके तौर पर यहाँ लिखते हैं :—
एक महात्मा अपने शिष्यके साथ किसी नगरमें गये। वहाँ उन्होंने देखा कि, एक साहूकार इन्द्रभवन जैसे मकानमें बैठता है, सैकड़ों सेवक आज़ापालनको तैयार खड़े हैं, जोड़ी-गाड़ी द्वारपर खड़ी हैं, हाथी झूम रहे हैं, सामने सोने चाँदी और हीरे पत्तोंके ढेर लग रहे हैं। महात्माको देखकर सेठने अपने एक कर्मचारीको उनको भोजन करानेकी आज्ञा दी। जब गुरु चेले भोजन करने बैठे, तब चेला बोला—“गुरु-जी ! आप कहते थे, संसारमें कोई भी सुखी नहीं है। देखिये,