भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ० )

यह सेठ कैसा सुखी है ! इसे किस बातका अभाव है ? लक्ष्मी इसकी दासी हो रही है ।” गुस्से कहा—“जरा सन्न करो । हम पता लगाकर कुछ कह सकेंगे ।” महात्माने जब भोजन कर लिया, तब सेठसे कहा—“सेठजी ! परमात्माने आपको सभी सुख दिये हैं ।” सेठने रोकर कहा—“महाराज ! मेरे समान इस जगत्में कोई दुःखी नहीं है । सुखे परमात्माने धनैश्वर्य सब कुछ दिया है, पर पुत्र एक भी नहीं । पुत्र बिना, ये सुख बिना नमकके पदार्थकी तरह अलौने और बेखाद है । मेरा दिल रात-दिन जला करता है, कभी सुखकी नींद नहीं आती । मैं इसी सोचमें जला जाता हूँ कि, पुत्र बिना इस सम्यत्तिको कौन भोगेगा ?” सेठकी बातें सुनकर चेलेने कहा—“हाँ गुरुजी, आपकी बात राई-रत्ती सच है । संसारमें कोई भी सुखी नहीं । कोई किसी दुःख-से-दुःखी है तो कोई किसी दुःख से ।

और भी :—

किसी नगरमें एक साहूकार था । उसके यहाँ धन-दौलत की कमी न थी । उसका धन-भाण्डार कुबेरके समान अक्षय था । जिसके पास अनुल धन है, उसे किस पदार्थका अभाव है ? वह साहूकार सब तरहसे इन्द्रके समान स्वर्ग-सुख भोग रहा था । इसी बीचमें दैवयोगसे उसकी ही बीमार हो गयी । हर तरहकी उत्तम चिकित्सा होने पर भी उसके बचने की आशा न रही । सेठ रोने लगा । खीने कहा—“आप क्यों

( ८ )

रोते हैं? आप धनी हैं, आपके सैकड़ों विवाह हो सकते हैं। मेरे मरते ही आपकी दूसरी शादी फौर्न हो जायगी। दुःख मुझे है कि, मैंने जगत्में आकर कुछ भी सुख न देखा।” सेठ ने कहा—“अगर तुम मर गयीं, तो मैं हरगिज़ दूसरी शादी न करूँगा।” सेठानीने कहा—“क्यों बातें बनाते हो? मेरे चल बसते ही, आप ये सब बातें भूल जायँगे।” सेठने जोशमें आकर मोहसे अपनी लिंगेन्द्रिय काटकर फँक दी। दैवयोग से सेठानी उसी समयसे चढ़ी होने लगी और चन्द्र रोज़में हृष्ट-पुष्ट हो गयी। शरीर सुखी होने पर उसे पुष्ट्यकी दरकार होने लगी। सेठको निकम्मा देखकर उसने नौकर चाकरोंसे कुकर्म करना आरम्भ कर दिया। सेठ यह हाल देखकर दिन-रात कुट्टने और जलने लगा। इसी बीचमें एक दिन गुरु नानक, भाई मरदानके साथ, उस नगरीमें पहुँचे। भाई मरदानने उस सेठका सुबैश्वर्य देखकर कहा—“गुरुजी! आप कहा करते हैं कि, इस जगत्में सुखी कोई भी नहीं है। कहिये इस सेठको क्या दुःख है?” गुरु नानकने कहा—“मरदान! यह सेठ ऊपरसे सुखी दीखता है, पर भीतरसे किसी-न-किसी दुःखसे अवश्य दुःखी होगा। चलो, हम इससे पुछवा देते हैं।” गुरुजीने सेठसे बात-चीतको, तो सेठने कहा—“महाराज! सबमुत्र हो मुझे कोई दुःख न था; पर अब इस दुःखसे जल-जलकर स्नाक हुआ जाता हूँ।” यह सुन गुरुजी ने कहा—“मरदान! इस गृहस्थाश्रममें कोई भी सुखी नहीं।”

( ६ )

संसारी लोग धनवानोंको सुखी समझते हैं, पर धन अनर्थों का मूल है। धन बड़े-बड़े अनर्थोंसे जमा होता है और जमा होनेपर भी दुःखोंका ही कारण होता है। इसके कमामें कष्ट और इसके रखनेमें कष्ट। मतलब यह कि, इसमें सब तरह दुःख-ही-दुःख हैं। धन-लोभसे चोर मार डालते हैं। अगर मार भी नहीं डालते, तो धन हर ले जाते हैं, तब धनोको महा कष्ट होता है। धनीके पुत्र-पौत्र या अन्य रिश्तेदार धनीकी मरण-कामना करते रहते हैं। धनीको हज़ारों तरहकी चिन्तायें घेरते रहती हैं। फलों आदमीमें रूकम डूब जायगी ; अमुक दिसावरमें घाटा होनेका भय है इत्यादि चिन्ताओंमें वह जला करता है।

अनेक लोग राजाओंको सुखी समझते हैं ; पर राजाओं को ज़रा भी सुख नहीं। राज्य महा अनर्थोंका कारण है। राजाको सदा यह भय लगा रहता है कि, कहीं गुनीम चढ़ न आवे। चोरोंका भय रहता है कि, कहीं वे राजलक्ष्मीको हर न ले जावें। अपने सगे-सम्बन्धियोंका भय लगा रहता है कि, वे कहीं राज्य-लोभसे घोखेंमें मार न डालें। क्योंकि अनेक पुत्रों या भाइयोंने राज्य-लोभसे राजा-बादशाहोंको मार डाला है। दुर्घोषनने राज्य हड़पनेके लिये भीमको विष दिया था ; पाँचों पाण्डवोंको लाक्षाभवनमें जीते ही जलाना चाहा था ; कैकेयीने अपने पुत्रको राज्य दिलानेकी गरज़से रामचन्द्रजीको वनवासकी आज्ञा दी थी। राज्यके लिये ही सुधीवने बालिको मरवा डाला था। राज्यके लिये

( १० )

कंसने अपनी सगी बहन देवकीके नवजात पुत्रोंकी हत्या करवा डाली थी। औरदुःखेबने अपने भाइयोंको जानसे मरवा डाला और पूज्यपाद पिताको कैद कर दिया। इससे स्पष्ट है कि, राजाको भी सुख नहीं। राजा लोग भयके मारे कभी एक पलंग पर नहीं सोते। मखमली पलंग होने पर भी उन्हें सुख की नींद नहीं आती।

जिसके अतुल धन-सम्पत्ति है, वह खीके व्यक्ति-चारिणी होने या पुत्रके अभाव अथवा पुत्रके सुपुत्र न होनेसे दुःखी है। जो राजराजेश्वर है, वह राज्यके सदा बने रहनेकी चिन्ता से दुःखी है। जिसके खी-पुत्र प्रभूति हैं, वह उनके मरण हो जाने या वियोगसे दुःखी है। कोई जवानीके चले जाने और बुढ़ापेके आ जानेसे दुःखी है। कोई मौतका ख्याल करके दुःखी है। सारांश यह कि, संसारमें कोई भी सुखी नहीं। इस जीवनमें सुखका नाम भी नहीं।

संसारी सुख अनित्य हैं।

सांसारिक सुख-भोग असार, अनित्य और नाशमान् हैं। ये सदा ख़िर रहने वाले नहीं; आज जो लक्ष्मीका लाल है, वह कल दर-दरका भिखारी देखा जाता है; तो आज जवान-पट्टा है, मिर्जा अकड़बेगकी तरह अकड़ता हुआ चलता है, वही कल बुढ़ापेके मारे लकड़ी टेक-टेककर चलता है। जिसे पहले सब लोग खूबसूरत कहते थे और मुहन्तसे पास थिताते

( ११ )

ये, अब उसके पास खड़ा होना भी नहीं चाहते। मतलब यह है कि, यौवन, जीवन, मन, धन, शरीर-छाया और प्रभुता ये सब अनित्य और वञ्छल हैं; अतः दुःखके कारण हैं। काया में मरण, लाभमें हानि, जीतमें हार, सुन्दरतामें असुन्दरता, भोगमें रोग, संयोगमें वियोग और सुखमें दुःख—ये सब दुःख के कारण हैं। अगर बिना मृत्युका जीवन, बिना रङ्गकी खुशी, बिना बुढ़ापे की जवानी, बिना दुःखका सुख, बिना वियोगका संयोग और सदा-सर्वदा रहने वाला धन होता, तो मनुष्यको इस जीवनमें अवश्य सुख होता।

विषय-भोगोंमें सुख नहीं है। ये असार हैं; केलेके पत्ते या प्याज़के छिलकोंकी तरह सारहीन हैं। फिर भी, मोहवश मनुष्य विषयोंमें फँसा रहता है। पर एक-न-एक दिन मनुष्य को इन विषय-भोगोंसे अलग होना ही पड़ता है। अलग होने के समय विषय-भोगीको बड़ा दुःख होता है। इससे विषय परिणाममें दुःखदायी ही हैं।

इसके सिवा, तरह-तरहके पुण्य सञ्चय करने, यज्ञ-याग आदि करने अथवा दान करनेसे मनुष्यको स्वर्ग मिलता है। वहाँ वह अमृत पीता और अप्सराओंको भोगता है, कल्प-वृक्षसे मनवाञ्छित पदार्थ पाता है, पर पुण्य-कर्मके नाश हो जाने या उनके फल भोग चुकने पर वह स्वर्गसे नीचे गिरा दिया जाता है; उसे फिर इसी मृत्युलोकमें आना होता है। उस समय वह स्वर्ग-सुखोंकी याद कर-करके मन-ही-मन

( १२ )

सोता और दुःखी होता है। इसीसे मुझे वे पुण्य-फल भी भया- वह मालूम होते हैं। परिणाममें वे भी दुःखोंके ही कारण होते हैं। तात्पर्य यह कि, संसार मिथ्या और सारहीन है। इसके सुख-भोग अनित्य, चञ्चल और सदा न रहने वाले हैं। इसीसे दुःखके कारण हैं। मृत्युलोक और स्वर्गलोकमें कहीं भी प्राणीको सुख नहीं है।

शिक्षा—अगर मनुष्य दुःखोंसे दूर रहना चाहे, सदा सुख भोगना चाहे, तो उसे अनित्य और नाशमान् पदार्थोंसे अलग रहना चाहिये। उनमें मोह न रखना चाहिये। स्त्री, पुत्र, धन, यौवन और स्वाभिन्न प्रवृत्ति अनित्य हैं। ये आज हैं और सम्भव है कि, कल न रहे। स्त्री-पुत्र प्रवृत्ति नानेदार हमारे सदाके सङ्गी नहीं। आज ये और हम सरायके मुसाफिरों की तरह मिल गये हैं, पर उम्मीद नहीं कि, फिर कभी मिलें। आज इनसे संयोग हुआ है, तो कल इनसे वियोग अवश्य होगा। ये तो क्या—जिस कायाको हम सबसे ज़ियादा चाहते हैं, मलते हैं, घोते हैं, सजाते हैं, वह भी तो एक दिन हमसे अलग हो जायगी। एक क्षणमें जीवका जन्म होता है, दूसरे क्षण ही नाश हो जाता है। जो अज्ञानी ऐसे नाशमान् पदार्थोंसे राग करते हैं, उन्हें दुःखोंके गहरे खड्डमें गिरना ही होता है। इसलिये बुद्धिमान्को लोक-परलोककी असारता और संयोग-वियोगका विचार करके अनित्य पदार्थोंसे प्रेम न करना चाहिये। उसे सदा नित्य अविनाशी आत्मा या परमात्मासे प्रेम करना चाहिये। शरीर नाश हो जाता है ; स्त्री-पुत्र धन आदि नाश हो जाते हैं, पर परमात्माका कभी, किसी कालमें भी, नाश नहीं होता। यह जगत् मिथ्या नाशमान्, जड़ और दुःखमय है ; पर यह आत्मा—ब्रह्म—चेतन, नित्य और सुखमय है। इस देह रूपी देवमन्दिरमें आत्मा ही देवता है। यही आत्मा संसारके सभी प्राणियों

A high-contrast black and white photograph showing a hand holding the right edge of a blank, perforated page from a book. The page is mostly white with some faint, illegible markings or smudges. The hand is visible on the right side, with fingers gripping the edge of the page. The background is dark and out of focus.

वैराग्यशतक ॥ ३ ॥

धन के लिये मैंने ब्रह्मनेक उपाय किये, जमीन खोदी, समुद्र में गोते लगाये, धातुएं कुर्की, रात-रात भर श्रमदान में सन्न जपे,—पर हाय ! मुझे एक कानी कौड़ी भी न मिली !

( १३ )

में वर्त्तमान है। इसी आत्माका चिन्तन करो, तो सदा सच्चा सुख भोग करोगे ; पर आत्मचिन्तन करना सहज काम नहीं है। इसके लिये मनको वशमें करना होगा, उसे विषयोंसे हटाना होगा, उसे बुद्धिसे अलगकर एकाग्र करना होगा। जब चित्त एकाग्र होगा, तभी सफलता हो सकेगी।

I do not see a good end of the deeds done in this world, and when I consider deeply even acts of benevolence which might have lost their their usefulness after they have given the results, fill me with fear. The objects of pleasure which have been acquired by the accomplishment of meritorious deeds and after long sustained efforts, do only give anxiety and torture to the pleasure-seeking mortals when they have to part with them in the flag-end.

उत्सर्वात् निश्चिंशंकया चित्तिर्लं ध्याता गिरिधांतवो

निस्तीर्णाः सरितांपतिर्नृपतयो यत्नेन सतोपिताः ॥

मन्वाराधनत्वरणं मनसा नीताः रमशाने निशाः

प्रातः काण्वराटकोऽपि न मया तुष्येऽधुना मुञ्चभाम् ॥४॥

धन मिलनेकी उम्मीदसे, मैंने जमीनके पैदे तक खोद डाले ; अनेक प्रकारकी पार्वतीय धातुएँ झूँक डालीं ; मातियोंके लिये समुद्र की भी थाह ले आया ; राजाओंका राजी रखनेमें भी कोई बात उठा न रखी ; मन्त्रसिद्धिके लिये रात-रात भर रमशानमें एकाग्रचित्तसे बैठठा हुआ जप करता रहा ; पर अफ़सोसकी बात है, कि इतनी आफ़तें उठाने पर भी एक कानी कौड़ी न मिली। इसलिये हे तुष्ये ! अब तो तू मेरा पीछा छोड़ ॥४॥

( १४ )

यह जान-सुनकर, कि ज़मानमें धन है, मैंने ज़मीनको पैंहे तक खोद डाला, पर कुछ भी न मिला। रसायन सिद्ध करने या सोना-चाँदी बनानेके लिये, मैंने अनेक तरहकी धातुयें फूँक डालीं, पर रसायन न बनी। फिर मैंने यह जानकर, कि समुद्र रत्नोंको खान है—उसमें मोतियोंको इफ़्तरात है; मैं समुद्रमें भी घुसा और उसकी शाह ले आया, मगर कुछ हाथ न आया। फिर यह सोचकर, कि राजाओंकी सेवा करनेसे धन हाथ आता है; मैंने उनके सन्तुष्ट करनेकी भी भर-पूर चेष्टायें कीं; उन्हें सब तरह खुश किया, पर फिर भी धन हाथ न आया। शेषमें, मैंने मन्त्रसिद्धि करनी चाही, इसलिये मैं रात-रातभर अकेला मरघटमें मुर्दाके पास बैठकर मन्त्र जपता रहा, कि वशीकरण मन्त्र सिद्ध हो जाय और राजाओंको वश करके धन प्राप्त करूँ; पर यहाँ भी मुझे निराशाका ही सामना करना पड़ा। सारी चेष्टायें करनेपर भी एक फूटो कौड़ी न मिली! इसलिये हे तृष्णा! अब मैं निराश हो गया हूँ। मुझे सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार दीखता है। अब तो तू दया करके मेरा पीछा छोड़ दे !

इसका यही मतलब है कि, भाग्यके विरुद्ध चेष्टा करना बुथा है। जितना धन भाग्यमें लिखा है, उतना तो बिना कोशिश किये, बिना किसीको खुशामद किये, बिना देश-विदेश डोले, घर बैठे ही मिल जायगा। भाग्यके लिखेसे अधिक हज़ारों चेष्टायें करने पर भी न मिलेगा। सिकन्दर

( १५ )

अमृतके लिये अँधेरी दुनियामें गया ; पर अमृतके कुण्डके पास पहुँच जाने पर भी, वह अमृतको खव न सका ; क्योंकि उसके भाग्यमें अमृत न था। मूर्ख मनुष्य भाग्यपर सन्तोष नहीं करता ; धनके लिये मारा-मारा फिरता है। जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है। किसी कविने ठीक ही कहा है :—

कवित ।

जो कुछ विधाता तेरे लिख्यो ललाट-पाट,

ताही पर आपना आप अमल करले ।

सोनेका सुमेर भावे देख वार पर भीष्म,

घटै वंदै नहिं यह निश्चय जिय धारले ।

देवीदास कहै जोई होनहार सोई हवै है,

मनमें विचार रैन दिन अनुसर ले ।

वापी कूप सरिता भरे हैं सात सागर पै,

तू तो तेरे वासन-समान पानी भर ले ।

शिक्षा—हे मनुष्य ! यदि तू सुख-शान्तिसे जीवन यापन करना चाहता है, तो तृष्णा-विद्याचीके फन्देसे निकल कर भाग्य पर सन्तोष कर। सन्तोष के सिवा सुख-शान्ति लाभ करनेका और उपाय नहीं है। यदि सन्तोष न करेगा, तो तृष्णाके सारे भटक-भटक कर दारो उग्र बाँहों रँवा देगा, और अन्तमें कुछ हाथ भी न खींचेगा।

( १६ )

कल्पय ।

खोदत डोल्यो भूमि, गडीहु न पाई सम्पति ।

घोंकत रह्यो पखान, कनकके लोभ लगी मति ॥

गयो सिन्दुके पास, तहाँ सुक्ताहु न पायो ।

कौड़ी कर नहीं लगी, नृपनको शीश नवायो ॥

साधे प्रयोग रमशानमें, भूत व्रेत बैताल सजि ।

कितहूँ भयो न बाँझित कङ्ख, अब तो तृष्णा मोहि तजि ॥४

4. I dug up the surface of the earth in search of treasure, burnt down various minerals in my hankering after alchemy, explored the ocean in search of pearls or in my greed after trade, tried my best to please the kings, and spent the whole nights in lonely cremation grounds reproducing chants with an all attentive mind, but it is a pity that I have gained not a single broken cowrie although I did all this. Do thou, O Greed, now leave me !

आनन्त देशमनेकदुर्गविषमं प्राप्तं न किञ्चित्फलं

त्यक्त्वा जानिकुलाभिमानमुचितं सेवां कृता निष्फलम् ॥

भुक्तं मानविवर्जितं परशुहैष्वाशंकया काकव-

त्तुष्णो दुर्भतिपापकर्मानिरते नाद्यापि संतुष्ट्यसि ॥५॥

मैं अनेक दुर्गम और कठिन स्थानोंमें डोलता फिरा, पर कुछ भी नतीजा न निकला । मैंने, अपनी जाति और अपने कुलका

( १७ )

अभिमान त्यागकर, पराई चाकरी भी की ; पर उससे भी कुछ न मिला । शेषमें, मैं कन्वेकी तरह डरता हुआ और अपमान सहता हुआ परायें घरोंके टुकड़े भी खाता फिरा । हे पाप-कर्म कराने वाली और कुमतिदायिनी तुम्झे ! क्या तुम्हे इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ ? ॥५॥

धनके लालचमें, मैं अपना देश और घर-द्वार छोड़कर ऐसे-ऐसे स्थानोंमें गया, जहाँ मनुष्य बड़ी कठिनाईसे पहुँच सकते हैं ; पर वहाँ जानेपर भी मुझे एक पाई न मिली । मैंने अपने द्विजत्व या ऊँची जातिके अभिमानको त्यागकर पराई नौकरी भी की और मालिकने जो-जो नीच कर्म कराये वही किये, लेकिन उससे भी मुझे धन न मिला । शेषमें, मैं मान-अपमान को छप्पर पर रखकर, बिना बुलाये ही लोगोंके घर गया और कन्वेकी तरह डरते-डरते खाता रहा । मुझे इन सब कामों से बड़ी ठेस लगी । मैंने अनेक प्रकारके कष्ट उठाये, मान खोया, लोगोंके कुवचन सहे, पर फिर भी मेरी कामना सिद्ध न हुई ! इसलिये कम्बल तृष्णा ! मैं तुफ़से पूछता हूँ कि, इतने कुकर्म करारकर भी तुम्हे सन्तोष हुआ या नहीं ?

छप्पय ।

भटको देश-विदेश, तहाँ फल कछुहू न पायो ।

निज कुलको अभिमान छोड़, सेवा चित लायो ॥

( १८ )

सहि गारी अरु खीफ, हाथ फारत घर आयो ।

दूर करत हूँ दौरि, स्वान-जिभि परग्रह खायो ॥

इहि भौति नवायो मोहि तैं, बहकायो दै लोभतल ।

अबहूँ न तोहि सन्तोष कहु, नृप्या ! तू पापिन प्रबल ॥५॥

5. I roamed about many difficult and impassable lands but it was all fruitless. I served others forsaking the reasonable pride of my tribe and family but it was of no use. I even dined in other people's houses where no respect was shown to me and where I had always been in suspense like a crow. Art thou not O evil natured Avarice, even now satisfied with having perpetrated so many misdeeds ?

खलोछापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरै-

निगृह्यान्तर्बाधं हसितमपिशून्येन मनसा ॥

कृतथितस्तम्भः प्रहसितथियामञ्जलिरपि

त्वआशे मोयाशे किमपरमते नर्यसि माध ॥ ६ ॥

मैंने दुष्टोंकी सेवा करते हुए उनकी तानेजनी और ठडेवाजी सही, भीतरके दुःखसे आये हुए और रोक और उद्दिष्ट चित्तसे उनके सामने हँसता रहा । उन हँसनेवालोंके सामने, चित्तको स्थिर करके, हाथ भी जोड़े । हे सूठी आशा ! क्या अभी और भी नाच नचायेगी ? ॥६॥

मैंने नीवोंको नौकरी करली । उनकी सेवा करते हुए मैंने

( १६ )

उन दुष्टोंके अवाजे-तवाजे, गाली-गठौज और दिल्ली सभी कुछ बर्दाश्त की। उनके वाग्वाणीसे मेरे कलेजमें छेद हो जाते थे और हृदय रोने लगता था। उसके कारणसे जो आँसू आते थे, उन्हें मैं रोक लेता था। भीतरसे मेरा दिल एकदम मुर्खा गया था, पर फिर भी मैं उनके सामने हँसा करता और कोधको दबाकर और विचको स्थिर और शान्त करके उन मसखरोंको मैंने हाथ भी जोड़े; पर फिर भी उनसे मुझे कुछ न मिला! हे आशा! निष्फल! आशा! इतने नाच तो नचाये, अब और तेरे दिलमें क्या है?

छप्पय।

सहे खलनके बैन इतै, पर तिनहिं रिझाये।

नैननको जल रोक, शून्य मन मुख सुसक्याये ॥

देत नहीं कछु विच, तज कर जोर दिखाये।

कर कर चाव करोर, मोरही दौरत घाये ॥

सुनि घ्रास! प्यास तेरी प्रबल, तू अति अदुभुत गति रहत।

इहि भौति नचायो मोहि, अब और कहा करिबो चहत? ॥६॥

6, I tolerated the jokes of evil-minded persons some how or other in my efforts to please them and while trying to stop my tears, I smiled at heart with an extremely desolate heart and even clasped my hands in feigned satisfaction before these sneering per-

( २० )

sons while trying hard to control the indignation of my heart. Wilt thou, O delusive Hope, make me dance still further ?

आदित्यस्य गतागतैरहरः संचीयते जीवितं व्यापारैर्वैदुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते ॥ दृष्ट्वा जनमजराविपत्तिमर्यां त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमर्थो प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥७॥

सूर्यके उदय और अस्तके साथ मनुष्योंकी जिन्दगी राज घटती जाती है। समय भागा जाता है, पर कारोबारमें मशगूल रहनेके कारण, वह भागता डुब्रा नहीं दीखता। लोगोंको पैदा होते, बूढ़े होते, विपत्ति-प्रसित होते और मरते देखकर भी मनमें भय नहीं होता। इससे मालूम होता है कि, मोहमयी प्रमादरूपी मदिरा (शराब) के नशेमें संसार मतवाला हो रहा है ॥७॥

देखते हैं, रोज ही सूर्य उदय होते हैं और अस्त होते हैं। रोज ही सवेरा होता है और रोज ही सन्ध्या होती है। सूर्यके उदयास्तके साथ-ही-साथ मनुष्योंकी आयु क्षीण होती जाती है; याना उम्र घटती जाती है। किसीने क्या खूब कहा है—

सुबह होती है शाम होती है ।

यौही उम्र तमास होती है ॥

और भी खुलासा ।

( २१ )

रोज़ सबेरा होता है और साँझ होती है; इस तरह नित्य हमारी आयु कम होती जा रही है। विचारकर देखने से बड़ा विस्मय होता है कि, दिन और रात कैसी तेज़ीसे होते चले जाते हैं। जिनको कोई काम नहीं है अथवा जो दुःखिया हैं, उन्हें तो ये बड़े भारी मालूम होते हैं, काटे नहीं कटते—एक-एक क्षण एक-एक वर्षके बराबर बीतता है; पर जो कारोबार या नौकरी-चाकरीमें लगे हुए हैं, उनका समय हवासे भी अधिक तेज़ीसे उड़ा चला जाता है, यानी कारोबार या धन्येमें लगे रहनेके कारण उन्हें मालूम नहीं होता। वे अपने कामोंमें भूलें रहते हैं और मृत्युकाल तेज़ीसे नज़दीक आता जाता है। जिस तरह डाक गाड़ीमें बैठने वाला यात्री अगर अकेला और उदासबित्त रहता है, तो उसके सफ़रका समय बड़ी कठिनाईसे बीतता है; पर यदि उसके साथ दो-चार मित्र या स्त्री-पुत्र प्रभृति होते हैं और वे उस गाड़ीमें हँसते-बोलते, खाते-पीते या आनन्द करने लगते हैं, आपसमें मनोरञ्जक कथा-वार्ता करते हैं, तो वह लोग तो आनन्दमें मग्न रहते हैं, और गाड़ी अपनी पूरी तेज़ीसे चली जाती है, उन्हें यह भी नहीं मालूम होता कि, कितनी राह तय हो गयी। जब सुनते हैं कि, देहली आ गयी, तब उन्हें विस्मयसा होता है; इसी तरह कारोबारमें लगे हुए लोगोंको मालूम नहीं होता और समय हवासे भी अधिक तेज़ीसे उड़ा चला जाता है और अन्तमें उनका अन्त करने वाला काल आ जाता है।

[ ( २२ ) ]

मनुष्य नित्य आँखोंसे देखता है कि, आज फलों मनुष्य चल बसा ; आज अमुक आदमी जो जवानीमें ऐश आराम करता था, घोड़े गाड़ियों पर चढ़ कर चलता था, बुढ़ा हो गया है ; उसकी जवानी, उसकी सुन्दरता न जाने कहाँ विलीन हो गयी है । अमुक आदमी जो करोड़पति था, जिसके यहाँ सैंकड़ों दास-दासी थे, जिसके सामने हीरे पनने और सोने चाँदीके ढेर लगे रहते थे, स्वयम् भिखारी हो गया है ; राजाने उसे जेलमें बन्द कर दिया है और उसके खो-पुत्र उसकी खबर भी नहीं लेते । नित्य मरण, जीवन, बुढ़ापा और विपत्ति देख कर भी मनुष्यके मनमें भय नहीं होता । वह दूसरोंको बुढ़ा हुआ देखता है, पर आप यही समझता है कि, मैं तो सदा जवान बना रहूँगा । अपने मित्र और नातेदारों को सर्वस्व छोड़कर मरते देखता है, पर आप समझता है कि, वे मर गये तो मर गये, मैं न मरूँगा । दूसरों पर विपत्ति पड़ी देखता है, पर इतना नहीं समझता कि, मुझ पर भी किसी दिन ऐसी ही विपद् आ सकती है । बहुतोंको श्मशान पर जाकर वैराग्य होता है, पर वह क्षण-भर ही टिकता है । स्नान करके घर आते ही याद भूलने लगती है और मनुष्य अपने धन्योमें लगकर तो बिल्कुल ही भूल जाता है । मनुष्य इतनी ग़फ़लत क्यों करता है ? इस ग़फ़लत और बेहोशी का कारण मोहमयी मदिरा है, जिसे पीकर संसार मतवाला हो रहा है ; क्योंकि मनुष्यको औरोंको बूढ़े होते और मरते देखकर भी चेत नहीं होता । इतना ही नहीं, अपनी कायामें रोग

[ २३ ]

और बुढ़ापा प्रभृति देखकर भी उसे जीने और सुख भोगनेकी आशा बनी रहती है । वह उसी आशाके सहारे लटकता हुआ अपना जीवन नष्ट करता है और उधर काल अपनी कतरनीसे उसकी जीवन-डोरीको काटता रहता है । शंकराचार्यजीने “मोहमुद्गर” में कहा है—

दिन यामिन्यौ सायं प्रातः,

शिशिर वसन्तौ पुनरायातः ।

कालः क्रीडति गच्छत्याशुः,

तदपि न मुञ्चत्याशावाशुः ॥

दिन-रात, सवेरे-साँझ, शीत और वसन्त आते और जाते हैं, काल क्रीड़ा करता है, जीवनकाल चला जाता है ; तोभी संसार आशाको नहीं छोड़ता ।

शिक्षा—मनुष्यो ! मिथ्या आशाके फेरमें दुर्लभ मनुष्य-देहको योंही नष्ट न करो । देखो, सिर पर काल नाच रहा है ; एक साँसका भी भरोसा न करो । जो साँस बाहर निकल गया है, वह वापस आवे या न आवे । इसलिये गफ़लत और बेहोशी छोड़कर, अपनी कार्योंको ज़रूरीभंगुर समझकर, दूसरोंकी भलाई करो और अपने सिरजनहारमें मन लगाओ ; क्योंकि नाता उसीका सच्चा है ; और सब नाते झूठे हैं । कहा है :—

माया संगी न मन सगो, सगो न यह संसार ।

परशुराम या जीवको, सगो सो सिरजनहार ॥

[ २४ ]

छप्पय ।

च उदैं अस्त रवि होत, आयुको क्षीन करत नित । क यह-धन्ये के माहिँ, समय वीतत अजान चित । हे आखिन देखत, जन्म जरा अरु विपति मरण नित । ग तज डरत नहिँ नैक, शंकडु नाहिँ करत चित । द जग जीव मोह-मदिरा पिये, झाके फिरत प्रमादमें । ल गिरपरत उठत फिर फिर गिरत, विषय-वासना स्वादमें ॥७॥

नि 7. Along with the rising and setting of the sun, one's life is म being daily exhausted. The Flight of Time is not perceived owing द to the heavy transaction of business absorbing all attention. O even अ the phenomena of birth, old age, distress and death do not strike पर terror into heart of man. It seems the head of the world has been turned by drinking the intoxicating wine of carelessness.

दू दीना दीनमुखैः सदैव शिशुकैराच्छजीर्णाम्बरा वि कोशद्विः क्षुधितैर्नरेन विधुरा दृश्येत चेदेहिनी ॥ व याच्चाभंगभयेन गङ्गदङ्गललुट्यद्विलीनाचारं हो को देहीति वदेत्स्वदण्डजठरस्यार्थं मनस्वी जनः ॥८॥

म स्त्रीके फटे हुए कपडोंको दीनातिदीन बालक खाँचते हैं, घरके क और मनुष्य भूखके मारे उसके सामने रोते हैं—इससे स्त्री अतीव रह दुःखित है । ऐसी दुःखिनी स्त्री यदि घरमें न होती, तो कौन धीर भो