वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें[ २४ ]
छप्पय ।
च उदैं अस्त रवि होत, आयुको क्षीन करत नित । क यह-धन्ये के माहिँ, समय वीतत अजान चित । हे आखिन देखत, जन्म जरा अरु विपति मरण नित । ग तज डरत नहिँ नैक, शंकडु नाहिँ करत चित । द जग जीव मोह-मदिरा पिये, झाके फिरत प्रमादमें । ल गिरपरत उठत फिर फिर गिरत, विषय-वासना स्वादमें ॥७॥
नि 7. Along with the rising and setting of the sun, one's life is म being daily exhausted. The Flight of Time is not perceived owing द to the heavy transaction of business absorbing all attention. O even अ the phenomena of birth, old age, distress and death do not strike पर terror into heart of man. It seems the head of the world has been turned by drinking the intoxicating wine of carelessness.
दू दीना दीनमुखैः सदैव शिशुकैराच्छजीर्णाम्बरा वि कोशद्विः क्षुधितैर्नरेन विधुरा दृश्येत चेदेहिनी ॥ व याच्चाभंगभयेन गङ्गदङ्गललुट्यद्विलीनाचारं हो को देहीति वदेत्स्वदण्डजठरस्यार्थं मनस्वी जनः ॥८॥
म स्त्रीके फटे हुए कपडोंको दीनातिदीन बालक खाँचते हैं, घरके क और मनुष्य भूखके मारे उसके सामने रोते हैं—इससे स्त्री अतीव रह दुःखित है । ऐसी दुःखिनी स्त्री यदि घरमें न होती, तो कौन धीर भो