भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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और बुढ़ापा प्रभृति देखकर भी उसे जीने और सुख भोगनेकी आशा बनी रहती है । वह उसी आशाके सहारे लटकता हुआ अपना जीवन नष्ट करता है और उधर काल अपनी कतरनीसे उसकी जीवन-डोरीको काटता रहता है । शंकराचार्यजीने “मोहमुद्गर” में कहा है—

दिन यामिन्यौ सायं प्रातः,

शिशिर वसन्तौ पुनरायातः ।

कालः क्रीडति गच्छत्याशुः,

तदपि न मुञ्चत्याशावाशुः ॥

दिन-रात, सवेरे-साँझ, शीत और वसन्त आते और जाते हैं, काल क्रीड़ा करता है, जीवनकाल चला जाता है ; तोभी संसार आशाको नहीं छोड़ता ।

शिक्षा—मनुष्यो ! मिथ्या आशाके फेरमें दुर्लभ मनुष्य-देहको योंही नष्ट न करो । देखो, सिर पर काल नाच रहा है ; एक साँसका भी भरोसा न करो । जो साँस बाहर निकल गया है, वह वापस आवे या न आवे । इसलिये गफ़लत और बेहोशी छोड़कर, अपनी कार्योंको ज़रूरीभंगुर समझकर, दूसरोंकी भलाई करो और अपने सिरजनहारमें मन लगाओ ; क्योंकि नाता उसीका सच्चा है ; और सब नाते झूठे हैं । कहा है :—

माया संगी न मन सगो, सगो न यह संसार ।

परशुराम या जीवको, सगो सो सिरजनहार ॥

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