भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

[ ( २२ ) ]

मनुष्य नित्य आँखोंसे देखता है कि, आज फलों मनुष्य चल बसा ; आज अमुक आदमी जो जवानीमें ऐश आराम करता था, घोड़े गाड़ियों पर चढ़ कर चलता था, बुढ़ा हो गया है ; उसकी जवानी, उसकी सुन्दरता न जाने कहाँ विलीन हो गयी है । अमुक आदमी जो करोड़पति था, जिसके यहाँ सैंकड़ों दास-दासी थे, जिसके सामने हीरे पनने और सोने चाँदीके ढेर लगे रहते थे, स्वयम् भिखारी हो गया है ; राजाने उसे जेलमें बन्द कर दिया है और उसके खो-पुत्र उसकी खबर भी नहीं लेते । नित्य मरण, जीवन, बुढ़ापा और विपत्ति देख कर भी मनुष्यके मनमें भय नहीं होता । वह दूसरोंको बुढ़ा हुआ देखता है, पर आप यही समझता है कि, मैं तो सदा जवान बना रहूँगा । अपने मित्र और नातेदारों को सर्वस्व छोड़कर मरते देखता है, पर आप समझता है कि, वे मर गये तो मर गये, मैं न मरूँगा । दूसरों पर विपत्ति पड़ी देखता है, पर इतना नहीं समझता कि, मुझ पर भी किसी दिन ऐसी ही विपद् आ सकती है । बहुतोंको श्मशान पर जाकर वैराग्य होता है, पर वह क्षण-भर ही टिकता है । स्नान करके घर आते ही याद भूलने लगती है और मनुष्य अपने धन्योमें लगकर तो बिल्कुल ही भूल जाता है । मनुष्य इतनी ग़फ़लत क्यों करता है ? इस ग़फ़लत और बेहोशी का कारण मोहमयी मदिरा है, जिसे पीकर संसार मतवाला हो रहा है ; क्योंकि मनुष्यको औरोंको बूढ़े होते और मरते देखकर भी चेत नहीं होता । इतना ही नहीं, अपनी कायामें रोग

वैराग्य शतक · पृष्ठ 91, कुल 648 में से · BharatKosha