भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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रोज़ सबेरा होता है और साँझ होती है; इस तरह नित्य हमारी आयु कम होती जा रही है। विचारकर देखने से बड़ा विस्मय होता है कि, दिन और रात कैसी तेज़ीसे होते चले जाते हैं। जिनको कोई काम नहीं है अथवा जो दुःखिया हैं, उन्हें तो ये बड़े भारी मालूम होते हैं, काटे नहीं कटते—एक-एक क्षण एक-एक वर्षके बराबर बीतता है; पर जो कारोबार या नौकरी-चाकरीमें लगे हुए हैं, उनका समय हवासे भी अधिक तेज़ीसे उड़ा चला जाता है, यानी कारोबार या धन्येमें लगे रहनेके कारण उन्हें मालूम नहीं होता। वे अपने कामोंमें भूलें रहते हैं और मृत्युकाल तेज़ीसे नज़दीक आता जाता है। जिस तरह डाक गाड़ीमें बैठने वाला यात्री अगर अकेला और उदासबित्त रहता है, तो उसके सफ़रका समय बड़ी कठिनाईसे बीतता है; पर यदि उसके साथ दो-चार मित्र या स्त्री-पुत्र प्रभृति होते हैं और वे उस गाड़ीमें हँसते-बोलते, खाते-पीते या आनन्द करने लगते हैं, आपसमें मनोरञ्जक कथा-वार्ता करते हैं, तो वह लोग तो आनन्दमें मग्न रहते हैं, और गाड़ी अपनी पूरी तेज़ीसे चली जाती है, उन्हें यह भी नहीं मालूम होता कि, कितनी राह तय हो गयी। जब सुनते हैं कि, देहली आ गयी, तब उन्हें विस्मयसा होता है; इसी तरह कारोबारमें लगे हुए लोगोंको मालूम नहीं होता और समय हवासे भी अधिक तेज़ीसे उड़ा चला जाता है और अन्तमें उनका अन्त करने वाला काल आ जाता है।