वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २० )
sons while trying hard to control the indignation of my heart. Wilt thou, O delusive Hope, make me dance still further ?
आदित्यस्य गतागतैरहरः संचीयते जीवितं व्यापारैर्वैदुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते ॥ दृष्ट्वा जनमजराविपत्तिमर्यां त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमर्थो प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥७॥
सूर्यके उदय और अस्तके साथ मनुष्योंकी जिन्दगी राज घटती जाती है। समय भागा जाता है, पर कारोबारमें मशगूल रहनेके कारण, वह भागता डुब्रा नहीं दीखता। लोगोंको पैदा होते, बूढ़े होते, विपत्ति-प्रसित होते और मरते देखकर भी मनमें भय नहीं होता। इससे मालूम होता है कि, मोहमयी प्रमादरूपी मदिरा (शराब) के नशेमें संसार मतवाला हो रहा है ॥७॥
देखते हैं, रोज ही सूर्य उदय होते हैं और अस्त होते हैं। रोज ही सवेरा होता है और रोज ही सन्ध्या होती है। सूर्यके उदयास्तके साथ-ही-साथ मनुष्योंकी आयु क्षीण होती जाती है; याना उम्र घटती जाती है। किसीने क्या खूब कहा है—
सुबह होती है शाम होती है ।
यौही उम्र तमास होती है ॥
और भी खुलासा ।