भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

( १६ )

उन दुष्टोंके अवाजे-तवाजे, गाली-गठौज और दिल्ली सभी कुछ बर्दाश्त की। उनके वाग्वाणीसे मेरे कलेजमें छेद हो जाते थे और हृदय रोने लगता था। उसके कारणसे जो आँसू आते थे, उन्हें मैं रोक लेता था। भीतरसे मेरा दिल एकदम मुर्खा गया था, पर फिर भी मैं उनके सामने हँसा करता और कोधको दबाकर और विचको स्थिर और शान्त करके उन मसखरोंको मैंने हाथ भी जोड़े; पर फिर भी उनसे मुझे कुछ न मिला! हे आशा! निष्फल! आशा! इतने नाच तो नचाये, अब और तेरे दिलमें क्या है?

छप्पय।

सहे खलनके बैन इतै, पर तिनहिं रिझाये।

नैननको जल रोक, शून्य मन मुख सुसक्याये ॥

देत नहीं कछु विच, तज कर जोर दिखाये।

कर कर चाव करोर, मोरही दौरत घाये ॥

सुनि घ्रास! प्यास तेरी प्रबल, तू अति अदुभुत गति रहत।

इहि भौति नचायो मोहि, अब और कहा करिबो चहत? ॥६॥

6, I tolerated the jokes of evil-minded persons some how or other in my efforts to please them and while trying to stop my tears, I smiled at heart with an extremely desolate heart and even clasped my hands in feigned satisfaction before these sneering per-