भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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यह सेठ कैसा सुखी है ! इसे किस बातका अभाव है ? लक्ष्मी इसकी दासी हो रही है ।” गुस्से कहा—“जरा सन्न करो । हम पता लगाकर कुछ कह सकेंगे ।” महात्माने जब भोजन कर लिया, तब सेठसे कहा—“सेठजी ! परमात्माने आपको सभी सुख दिये हैं ।” सेठने रोकर कहा—“महाराज ! मेरे समान इस जगत्में कोई दुःखी नहीं है । सुखे परमात्माने धनैश्वर्य सब कुछ दिया है, पर पुत्र एक भी नहीं । पुत्र बिना, ये सुख बिना नमकके पदार्थकी तरह अलौने और बेखाद है । मेरा दिल रात-दिन जला करता है, कभी सुखकी नींद नहीं आती । मैं इसी सोचमें जला जाता हूँ कि, पुत्र बिना इस सम्यत्तिको कौन भोगेगा ?” सेठकी बातें सुनकर चेलेने कहा—“हाँ गुरुजी, आपकी बात राई-रत्ती सच है । संसारमें कोई भी सुखी नहीं । कोई किसी दुःख-से-दुःखी है तो कोई किसी दुःख से ।

और भी :—

किसी नगरमें एक साहूकार था । उसके यहाँ धन-दौलत की कमी न थी । उसका धन-भाण्डार कुबेरके समान अक्षय था । जिसके पास अनुल धन है, उसे किस पदार्थका अभाव है ? वह साहूकार सब तरहसे इन्द्रके समान स्वर्ग-सुख भोग रहा था । इसी बीचमें दैवयोगसे उसकी ही बीमार हो गयी । हर तरहकी उत्तम चिकित्सा होने पर भी उसके बचने की आशा न रही । सेठ रोने लगा । खीने कहा—“आप क्यों

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