भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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रोते हैं? आप धनी हैं, आपके सैकड़ों विवाह हो सकते हैं। मेरे मरते ही आपकी दूसरी शादी फौर्न हो जायगी। दुःख मुझे है कि, मैंने जगत्में आकर कुछ भी सुख न देखा।” सेठ ने कहा—“अगर तुम मर गयीं, तो मैं हरगिज़ दूसरी शादी न करूँगा।” सेठानीने कहा—“क्यों बातें बनाते हो? मेरे चल बसते ही, आप ये सब बातें भूल जायँगे।” सेठने जोशमें आकर मोहसे अपनी लिंगेन्द्रिय काटकर फँक दी। दैवयोग से सेठानी उसी समयसे चढ़ी होने लगी और चन्द्र रोज़में हृष्ट-पुष्ट हो गयी। शरीर सुखी होने पर उसे पुष्ट्यकी दरकार होने लगी। सेठको निकम्मा देखकर उसने नौकर चाकरोंसे कुकर्म करना आरम्भ कर दिया। सेठ यह हाल देखकर दिन-रात कुट्टने और जलने लगा। इसी बीचमें एक दिन गुरु नानक, भाई मरदानके साथ, उस नगरीमें पहुँचे। भाई मरदानने उस सेठका सुबैश्वर्य देखकर कहा—“गुरुजी! आप कहा करते हैं कि, इस जगत्में सुखी कोई भी नहीं है। कहिये इस सेठको क्या दुःख है?” गुरु नानकने कहा—“मरदान! यह सेठ ऊपरसे सुखी दीखता है, पर भीतरसे किसी-न-किसी दुःखसे अवश्य दुःखी होगा। चलो, हम इससे पुछवा देते हैं।” गुरुजीने सेठसे बात-चीतको, तो सेठने कहा—“महाराज! सबमुत्र हो मुझे कोई दुःख न था; पर अब इस दुःखसे जल-जलकर स्नाक हुआ जाता हूँ।” यह सुन गुरुजी ने कहा—“मरदान! इस गृहस्थाश्रममें कोई भी सुखी नहीं।”

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