वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६ )
संसारी लोग धनवानोंको सुखी समझते हैं, पर धन अनर्थों का मूल है। धन बड़े-बड़े अनर्थोंसे जमा होता है और जमा होनेपर भी दुःखोंका ही कारण होता है। इसके कमामें कष्ट और इसके रखनेमें कष्ट। मतलब यह कि, इसमें सब तरह दुःख-ही-दुःख हैं। धन-लोभसे चोर मार डालते हैं। अगर मार भी नहीं डालते, तो धन हर ले जाते हैं, तब धनोको महा कष्ट होता है। धनीके पुत्र-पौत्र या अन्य रिश्तेदार धनीकी मरण-कामना करते रहते हैं। धनीको हज़ारों तरहकी चिन्तायें घेरते रहती हैं। फलों आदमीमें रूकम डूब जायगी ; अमुक दिसावरमें घाटा होनेका भय है इत्यादि चिन्ताओंमें वह जला करता है।
अनेक लोग राजाओंको सुखी समझते हैं ; पर राजाओं को ज़रा भी सुख नहीं। राज्य महा अनर्थोंका कारण है। राजाको सदा यह भय लगा रहता है कि, कहीं गुनीम चढ़ न आवे। चोरोंका भय रहता है कि, कहीं वे राजलक्ष्मीको हर न ले जावें। अपने सगे-सम्बन्धियोंका भय लगा रहता है कि, वे कहीं राज्य-लोभसे घोखेंमें मार न डालें। क्योंकि अनेक पुत्रों या भाइयोंने राज्य-लोभसे राजा-बादशाहोंको मार डाला है। दुर्घोषनने राज्य हड़पनेके लिये भीमको विष दिया था ; पाँचों पाण्डवोंको लाक्षाभवनमें जीते ही जलाना चाहा था ; कैकेयीने अपने पुत्रको राज्य दिलानेकी गरज़से रामचन्द्रजीको वनवासकी आज्ञा दी थी। राज्यके लिये ही सुधीवने बालिको मरवा डाला था। राज्यके लिये