भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कंसने अपनी सगी बहन देवकीके नवजात पुत्रोंकी हत्या करवा डाली थी। औरदुःखेबने अपने भाइयोंको जानसे मरवा डाला और पूज्यपाद पिताको कैद कर दिया। इससे स्पष्ट है कि, राजाको भी सुख नहीं। राजा लोग भयके मारे कभी एक पलंग पर नहीं सोते। मखमली पलंग होने पर भी उन्हें सुख की नींद नहीं आती।

जिसके अतुल धन-सम्पत्ति है, वह खीके व्यक्ति-चारिणी होने या पुत्रके अभाव अथवा पुत्रके सुपुत्र न होनेसे दुःखी है। जो राजराजेश्वर है, वह राज्यके सदा बने रहनेकी चिन्ता से दुःखी है। जिसके खी-पुत्र प्रभूति हैं, वह उनके मरण हो जाने या वियोगसे दुःखी है। कोई जवानीके चले जाने और बुढ़ापेके आ जानेसे दुःखी है। कोई मौतका ख्याल करके दुःखी है। सारांश यह कि, संसारमें कोई भी सुखी नहीं। इस जीवनमें सुखका नाम भी नहीं।

संसारी सुख अनित्य हैं।

सांसारिक सुख-भोग असार, अनित्य और नाशमान् हैं। ये सदा ख़िर रहने वाले नहीं; आज जो लक्ष्मीका लाल है, वह कल दर-दरका भिखारी देखा जाता है; तो आज जवान-पट्टा है, मिर्जा अकड़बेगकी तरह अकड़ता हुआ चलता है, वही कल बुढ़ापेके मारे लकड़ी टेक-टेककर चलता है। जिसे पहले सब लोग खूबसूरत कहते थे और मुहन्तसे पास थिताते