वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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ये, अब उसके पास खड़ा होना भी नहीं चाहते। मतलब यह है कि, यौवन, जीवन, मन, धन, शरीर-छाया और प्रभुता ये सब अनित्य और वञ्छल हैं; अतः दुःखके कारण हैं। काया में मरण, लाभमें हानि, जीतमें हार, सुन्दरतामें असुन्दरता, भोगमें रोग, संयोगमें वियोग और सुखमें दुःख—ये सब दुःख के कारण हैं। अगर बिना मृत्युका जीवन, बिना रङ्गकी खुशी, बिना बुढ़ापे की जवानी, बिना दुःखका सुख, बिना वियोगका संयोग और सदा-सर्वदा रहने वाला धन होता, तो मनुष्यको इस जीवनमें अवश्य सुख होता।
विषय-भोगोंमें सुख नहीं है। ये असार हैं; केलेके पत्ते या प्याज़के छिलकोंकी तरह सारहीन हैं। फिर भी, मोहवश मनुष्य विषयोंमें फँसा रहता है। पर एक-न-एक दिन मनुष्य को इन विषय-भोगोंसे अलग होना ही पड़ता है। अलग होने के समय विषय-भोगीको बड़ा दुःख होता है। इससे विषय परिणाममें दुःखदायी ही हैं।
इसके सिवा, तरह-तरहके पुण्य सञ्चय करने, यज्ञ-याग आदि करने अथवा दान करनेसे मनुष्यको स्वर्ग मिलता है। वहाँ वह अमृत पीता और अप्सराओंको भोगता है, कल्प-वृक्षसे मनवाञ्छित पदार्थ पाता है, पर पुण्य-कर्मके नाश हो जाने या उनके फल भोग चुकने पर वह स्वर्गसे नीचे गिरा दिया जाता है; उसे फिर इसी मृत्युलोकमें आना होता है। उस समय वह स्वर्ग-सुखोंकी याद कर-करके मन-ही-मन